बाबा साहब तुम्हे जो न जाने,
बाबा साहब तुम्हे जो न जाने,
क्या दिया है तुमने वो न पहचाने,
संविधान को तनिक भी न पढ़े है,
क्या अधिकार स्वयं के उनके,
कैसे अपने हक के खातिर लड़ेंगे।
बाबा साहब तुम्हे जो न जाने,
सच कहते है रहेंगे पछताने,
वंचित रह जाते शिक्षा से आज भी,
पा कर नौकरी भूल जाते आपको,
कैसे अपनों के खातिर तेरे मिशन को बढ़ाएंगे।
बाबा साहब तुम्हे जो न जाने,
संघर्ष की कहानी दिल में न उतारे,
दर्द महसूस क्या करेंगे ?
भेदभाव , छुआछूत और न्याय का,
कैसे तेरे कृपा को वंचितों तक ले जाएंगे।
बाबा साहब तुम्हे जो न जाने,
तेरे स्वाभिमान को न पहचाने,
कैसे दीक्षा भूमि में वह जायेंगे,
बुद्ध का ज्ञान अपना कर दुनिया में फैलाएंगे,
कैसे तेरी महिमा का बखान जुबान पर लाएंगे।
रचनाकार
बुद्ध प्रकाश
मौदहा हमीरपुर।