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1 Nov 2025 · 2 min read

#प्रसंगवश

#प्रसंगवश
#व्यंग्य_कविता
जय जय जय जय माय प्रदेश।
(प्रणय प्रभात)

“मर्यादा का मुंह काला, नैतिकता का दीवाला।
सम्मानित फूहड़ बोली, लज्जा की जलती होली।।
नंगेपन को छूट खुली, रेवड़ियों की लूट खुली।
फर्जी बिल कागज़ जाली, पाबंदी ढीली ढाली।।
किरदारों से उठती बू। बनी सियासत नगरवधू।
इतना जातिवाद पाला, बनी अखाड़ा हर शाला।।
खुले घूमते व्यभिचारी, सड़कों पर मारा मारी।
सही उपज के दाम नहीं, मेहनतकश को काम नहीं।।
गदहों ने पीछे छोड़े, एक हुए खच्चर घोड़े।
चांदी काट रहे चउए, हंसों के सिर पे कउए।।
हर दिन नई नई थीमें, बेमतलब की स्कीमें।
रीति नीति का पता नहीं, रिश्वतखोरी खता नहीं।।
हर वितरक जीजा साला, राशन तक में घोटाला।
हर काला होता भूरा, आधी बिजली बिल पूरा।।
अस्पताल में दवा नहीं, कहां गई ये हवा नहीं।
बिन खर्चे के जांच नहीं, मनमानी पे आंच नहीं।।
पीड़ा कितनी पूछ मती, देख खाट पे गर्भवती।
फूट फूट पीड़ित रोते, बाइक पर लाशें ढोते।।
बच्चों की जानें लीली, सीरप निकली ज़हरीली।
बोरवेल में कई गिरे, फिर भी दोषी नहीं घिरे।।
जीवित की ना सुनवाई, मर जाने पे भरपाई।
शिक्षक चला चली में है, शिक्षा परखनली में है।।
रोज़ नए हथकंडे हैं, लूटपाट के फंडे हैं।
मोबाइल में एप भरो, सारा दिन बेगार करो।।
हो ले भले ठगी कैसी, निजता की ऐसी तैसी।
परेशान इक इक कर्मी, ये सिस्टम की बेशर्मी।।
डेटा चोरों को कंधा, अरबों का गोरखधंधा।
दुर्घटना का दंश बढ़ा, वारदात का वंश बढ़ा।।
मूल्यवान के मोल घटे, प्रतिभाओं के पंख कटे।
चोर बन गए भंडारी, बढ़ती काला बाज़ारी।।
जिसने खाया उसे पचा, कोई अंकुश नहीं बचा।
आम लोग अब बेचारे, झूठमूठ के जयकारे।।
ताक़त नेता की बांदी, भाई भतीजों की चांदी।
नौकरशाहों की तूती, पुजे माफिया की जूती।।
कांव कांव करते हूटर, गली गली फिरते शूटर।
जुमलों में भारी लच्छे, कथित रूप से दिन अच्छे।।
जो जनता के ठुकराए, सभी तख्त पर पधराए।
एग्जाम का सिस्टम वीक, एक माह दो पेपर लीक।।
नक्काली को संरक्षण, रक्षक ही करते भक्षण।
नकली दारू और दवा, दिन का वादा रात हवा।।
जो प्रभार में सब भारी, कहीं न लगते अधिकारी।
नहीं हारती खामी है, पद पद की नीलामी है।।
हर सिर कर्जे की गठरी, मुर्दे से मंहगी ठठरी।
चोर सिपाही पर हावी, हर छुटभैया मायावी।।
खतरे में हर ख्वाहिश है, हर दिन एक नुमाइश है।
धंसी सड़क रजधानी में, तैर गए पुल पानी में।।
ईंधन में पानी का मेल, यहां मिलावट केवल खेल।।
धनकुबेर अनगिनत यहां, ढूंढ रहे हो आप कहां?
चांदी सोने की सिल्ली, हर दिन उड़ा रही खिल्ली।।
हर कोठी है एक किला, बोरा भर भर माल मिला। थकी मशीनें गिन गिन केश, हैपी बड्डे “माय” प्रदेश।।”

संपादक
न्यूज़&व्यूज
श्योपुर (मप्र)

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