बिसावर की कुंडलिया
सोते आधी रात को, जगते हैं उग धूप।
जीवन है शैतान का, किंतु सोचते भूप।
किंतु सोचते भूप, विरोध सौरमंडल से।
है तन-मन कमजोर, जुड़े हैं बस डंठल से।
कहे ‘बिसावर’ मीत, जवानी खोकर रोते।
करते पश्चाताप, मनुज यों जगते सोते।।
सोते आधी रात को, जगते हैं उग धूप।
जीवन है शैतान का, किंतु सोचते भूप।
किंतु सोचते भूप, विरोध सौरमंडल से।
है तन-मन कमजोर, जुड़े हैं बस डंठल से।
कहे ‘बिसावर’ मीत, जवानी खोकर रोते।
करते पश्चाताप, मनुज यों जगते सोते।।