मनमोहन
///मनमोहन///
हे! मनमोहन मुरली वाले रे,
है तुझे कौन जगत में प्यारा।
गोपियां ही चिर सखियां हैं,
या गोप ग्वाल चमू ये सारा।।
तुमने तो अर्जुन को जग हित,
दी अजस्र ज्ञान गंग की धारा।
सुधन्वा के अंतर्मन में बस कर,
तत्क्षण ही भक्ति कृपा से तारा।।
मीरा के पद नुपुरों की झंकार,
ले आते भक्ति संगीत प्रवाह।
चैतन्य प्रभु के रग रग में भी जो,
सदा उठ पड़ता नृत्य आवाह।।
सूरदास नेत्रहीन होकर भी,
तुम्हें देखते हृदय अंतर में।
योगी भी तेरी कृपा छाया में,
चढ़ते ब्रह्म मंडल प्रांतर में।।
भारत के आबाल वृद्ध सब,
गावें हरे कृष्ण का नारा।
हे! मनमोहन मुरली वाले रे,
तुझे कौन जगत में प्यारा।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)