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31 Oct 2025 · 3 min read

लेखकीय

सतनाम रहस्यवाद से…
रहस्यवाद एक आध्यात्मिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण है, जो रहस्यमय और अदृश्य तत्वों को समझने और अनुभव करने पर केंद्रित है। रहस्यवाद विश्व के प्रायः सभी धर्मों और संस्कृतियों में पाया जाता है। इसके माध्यम से लोग अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बनाने का प्रयास करते हैं। सरल शब्दों में रहस्यवाद गूढ़ ज्ञान पर आधारित धारणा है, जिसके बारे में केवल अनुमान लगाया जा सकता है।

रहस्यवाद मेरे लिए बहुत कठिन शब्द और कठिन विषय रहा है। लेकिन मुझे हर कठिन कार्यों और विषयों को समझने में दिलचस्पी रही है। यह मेरी स्वभावगत विशेषता है। इसी का नतीजा है कि मैंने काफी लगन और परिश्रम करके अच्छे से समझ कर, बूझ कर, सोच कर, विचार कर अपने सर्वोत्तम विवेक से इस कृति को लिखने का साहसिक कार्य किया है। मेरा अनुमान है कि सतनाम रहस्यवाद पर इससे अच्छी कृति अब तक नहीं लिखी गई है।

बिलासपुर जिले के बिल्हा प्रखण्ड में स्थित पिरैया ग्राम के सूरदास गुरुजी की याद इस कृति को लिखते समय मुझे अनेक बार आई। उनके जैसा ज्ञानी, सहिष्णु और सहनशील मानव मैंने अब तक नहीं देखा है। सम्भवतः उन्हें अक्षर ज्ञान नहीं था। लेकिन ‘चलती नाम’, ‘पंछी नाम’ जैसे दुर्लभ नाम का उन्हें ज्ञान था। वह तम्बूरे में बहुत शानदार भजन गाया करते थे। उनकी वाणी में गजब की मिठास थी। उनका कहना था कि – “चलती नाम ओही मनखे ल सिखाय जाथे जउन ह चार टेम्पा (लाठी) मार खाय के बाद भी दुसमन ल मारे बर झन सोच सकय। मेहा ओइसने मनखे खोजत हँव। लकिन मोर खोज ह अभी ले पूरा नइ होए। काबर के ए नाम ह ए भुइयाँ म रहि जाय, मोर संग दफन झन हो जाय।”

मुझे बिल्कुल भी पता नहीं है कि सूरदास गुरुजी की वह तलाश पूरी हुई कि नहीं? लेकिन अनुमान के अनुसार सन 1990 में वे सतलोकी हो गए थे। तब शासकीय सेवा में मेरी पोस्टिंग जगदलपुर-बस्तर में होने के कारण मुझे ज्ञात नहीं हो सका। उस समय संचार के प्रभावी साधन भी नहीं थे अथवा जो थे भी वह अत्यन्त ही कम थे।

सूरदास का अर्थ जन्मान्ध होता है, परन्तु गुरुजी जन्मान्ध नहीं थे। चेचक ने उनकी आँखों की रोशनी छीन ली थी। वह डेढ़ दो साल में एकाध बार हमारे यहाँ मस्तूरी आते थे और लगभग सप्ताह भर ठहरते थे। वही मुझे बताए थे कि गुरु घासीदास को घनघोर गुरु क्यों कहते हैं? जिस प्रकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ‘बैंकों का बैंक’ होता है, ठीक उसी प्रकार घासीदास जी ‘गुरुओं के गुरु’ थे। अर्थात् वे ‘घनघोर गुरु’ थे।उनमें असाधारण ज्ञान और विद्वता थी। वह साधना सम्पन्न व्यक्तित्व थे। वह परमसत्ता के प्रतिनिधि थे। वह एक महान मसीहा थे। वैसे व्यक्ति संसार में विरले ही होते हैं।

बाबा गुरु घासीदास अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी कभी विचलित नहीं हुए। झख गोरा रंग के अनुरूप वे स्वभाव से अत्यन्त शालीन और शीतल थे। एक बार सोनाखान के जमींदार ने अगड़ों के षड्यंत्र और गुरुजी की बढ़ती हुई प्रसिद्धि से चिढ़ कर क़ुर्रू पाठ की खौफनाक गुफा में दंतेश्वरी देवी को बलि देने के लिए गुरु घासीदास को डलवा दिया था, जहाँ खुद देवी दंतेश्वरी अपनी तलवार से सिर काटकर बालि लेती थी। लेकिन इस रहस्यमयी गुफा में गुरुजी का देवी दंतेश्वरी से साक्षात्कार हुआ था। वह गुरुजी की विद्वत्ता, निडरता और शीतल वाणी से प्रभावित होकर अभयदान दे दी थी। आगे का विवरण सतनाम रहस्यवाद पुस्तक में पढ़ सकते हैं। सते हितम् ।

डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
साहित्य वाचस्पति
प्रशासनिक अधिकारी

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