दरार
मैंने थामी थी
सीमेंट की बोरी,
हाथों में था
मरम्मत का भ्रम।
हर कण को प्रेम से
जोड़ा था, मैंने सोचा—
अब एक होगी दीवार,
फिर से।
पर दरार?
वह तो एक ज़िद्दी पहचान थी।
जैसे पुराना घाव
जो भर जाता है ऊपर से,
पर भीतर कसक बनी रहती है।
मेरी हर कोशिश,
उसमें नया प्लास्टर चढ़ाती,
मगर वह सिर्फ़ एक परत थी
जो असली जुड़ाव नहीं लाती।
वह दरार,
किसी अधूरी बात सी थी,
जो कही तो गई थी, पर सुनी नहीं गई थी।
किसी टूटे रिश्ते की कसक,
जो क्षमा माँगने से नहीं,
समझने से जुड़ती है।
वह दो हिस्सों के बीच की
अदृश्य सीमा-रेखा थी,
जिसे जोड़ने का हर प्रयास
उसे और गहरा कर रहा था।
मैंने भर-भर कर देखा
विश्वास के कणों से,
वादों के पानी से उसे सींचा।
पर वह तो मिट्टी का स्वभाव था
कि खंडित हो तो
खंडित ही रहता है,
केवल छद्म-एकता जीता है।
अंत में, मैं थककर हारी,
अपनी हथेली को देख कर मुस्कुराई:
“यह दरार,” मैंने कहा, “यह दीवार नहीं।”
यह तो उस सच का चिह्न है,
जिसे मैंने बदलना चाहा, पर
वह अपनी प्रकृति में अटल रहा।
वह दरार
अब मेरी पहचान में घुल गई है,
एक सीखा हुआ सबक
कि कुछ चीजें
सिर्फ़ दरार ही रह सकती हैं,
कभी दीवार नहीं बन सकतीं।