व्यंग्य नेता जी का पत्र गंगा मैया के नाम
व्यंग्य
नेता जी का पत्र गंगा मैया के नाम
हे गंगे मैया
आपको याद होगा, मैं पिछली बार भी आया था। दल बल के साथ । मेरे पापों का घड़ा हर साल भर जाता है। क्या करूं ? तुम तो पतित पावनी हो, धो देती हो। इस बार बिहार में चुनाव चल रहे हैं। मेरी ड्यूटी पार्टी ने वहां लगा दी है। चाहते हुए भी मैं वहां नहीं आ पा रहा हूं।
हे देवी
तुम तो जानती हो, वहां झूठ बोलना पड़ेगा। पानी के गिलास को दूध का कहना पड़ेगा। इस बार वहां दिक्कत ज्यादा है। सवाल देशी और परदेशी का है। परदेशी से गलत आशय मत लगाना। अपने ही देश में जो बाहरी हैं, मैं उनकी बात कर रहा हूं। चुनाव आयोग ने एसआईआर कराया। राहुल गांधी ने आरोप जड़ा-वोट चोरी। बस, इसी कारण से दिक्कत है। वरना मैं अवश्य आता।
हे पतितपावनी
मैंने सोचा, चुनाव निबट जाएं। फिर इकट्ठा ही आऊंगा। पहले तो सवा रुपये का प्रशाद चढ़ता था। बात-बात पर लोग बोल देते थे….पास हो जाऊं….सवा रुपये का प्रशाद चढाऊंगा। मैं तो नेता हूं मैया। मैं सवा रुपये के चक्कर में नहीं पड़ता। अच्छा-खासा बिजनेस है। आपकी कृपा से सभी कुछ है। जो मुझसे बन सकेगा, मैं करूंगा। आप कहोगी तो पार्टी फंड से भी कुछ न कुछ कर दूंगा। पहले सारे पाप इकट्ठा कर लूं, फिर आपकी गोद में आऊंगा।
हे निर्मला
पाप को गलत मत समझना। वैसे भी पाप और पुण्य की कोई परिभाषा नहीं। किसी के लिए पाप है। किसी के लिए पुण्य। झूठ बोलना, पाप है। राजनीति में पुण्य। अब क्या कहें बा ? घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? नेता झूठ नहीं बोलेगा तो बेचेगा क्या ? मैया, हमारा भी घर परिवार है। दरबार है। सुबह से अपने यहां लाइन लग जाती है। फरियादियों से ज्यादा तो वर्कर आ जाते हैं। इनको कैसे बहलाऊं । आपकी कृपा है भगवती। दिन भर गोली देता हूं। सड़क से सदन तक। अपना बिजनेस चौक्खा चल रहा है। हे सुरेश्वरी ! हम तो सनातनी हैं। आपमें आस्था है। इसलिए, हर साल आ जाते हैं। हमारे पाप कहां ? पाप तो वे करते हैं। जो गंगाजी पर आकर नहाते भी नहीं। संविधान की किताब हाथ में लेकर चलते हैं। और मानते नहीं।
हम जानते हैं, यह पॉलिटिकल भाषण देने का वक्त नहीं है। आप बिजी हो। आपको सबके पाप धोने हैं।
हे भागीरथी !
भागीरथ ने एक काम तो अच्छा किया। आपको यहां ले आए । आज आतीं तो स्टे हो जाता। हमारे बहुत से काम तो इसी कारण नहीं होते। “देखो भाई” बीच में आ जाते हैं। हमारे बहुत सारे प्रोजेक्ट आपके लिए चल रहे हैं। यह गोली नहीं है। सच्ची-सच्ची। आप भी बहती रहती हो।और प्रोजेक्ट भी चलते रहते हैं।
आप क्या जानो ? जब विपक्ष के लोग आपको गंदा करते हैं। तो हम यहां आकर आरती करते हैं। आपके चरणों में दूध चढ़ाते हैं। दूध असली है या सिथेंटिक..? हमको नहीं पता। लेकिन चढ़ता तो है। राजनीति में चढावे का ही महत्व है । जो घाट-घाट का पानी न पीये, वह कैसा नेता ? ‘घाट-घाट का पानी’ यानी गंगा तेरा पानी अमृत । फिर भी हम पर आरोप…हम गंगा विरोधी । मैया! हम तो गंगा जल ही पीते हैं। जनता पीती है नीर। जो रेलवे स्टेशन पर मिलता है।
सूर्यकांत
02.11.2014