बात बिगड़ी जो थी वो बनाते रहे
बात बिगड़ी जो थी वो बनाते रहे
गम छुपाते रहे मुस्कुराते रहे
मुतमइन था की दर तो खुलेगा नहीं
बारगाहों के चक्कर लगाते रहे
उनको मुझसे ज़रा भी अदावत न थी
शौकिया ही मुझे वो सताते रहे
साक़ियो ने मिरा दिल न तोड़ा कभी
ड्राइ डे में भी मुझको पिलाते रहे
दिल के जज़्बात तो दिल में ही रह गए
होंठ जुम्बिश में बस कँपकँपाते रहे
सर पे अपने पड़ी कुछ न सूझा उन्हे
यूँ तो मंतिख सभी को बताते रहे
दौर ए तन्हाई में रात भर जागकर
हम सितारों को रस्ता बताते रहे
मेरे जख्मों को कोई न मरहम मिला
इब्ने मरियम बहुत आते जाते रहे
रंग उनका न कागज पे उतरा कभी
रंग में रंग कितने मिलाते रहे
मैं सुयोधन की ही क्यों शिकायत करूं
दांव पर तो युधिष्ठिर लगाते रहे