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31 Oct 2025 · 1 min read

तुम और तुम्हारी आँखें

तुम्हारा चेहरा—
साहित्य की तरह कोमल।

तुम्हारे बाल—
अर्थशास्त्र की तरह
कभी ऊपर, कभी नीचे।

तुम्हारे शब्द—
दर्शन की तरह गहन।

पर तुम्हारी आँखें—
भौतिकी की तरह अत्यंत जटिल
सूत्रों और अनगिनत प्रश्नों से भरी हुई।

मैं समझ सकता हूँ
साहित्य, अर्थशास्त्र और दर्शन—सब कुछ।
पर कृपया…
भौतिकी जैसी आँखों से मत देखना मुझे
मैं कहीं खो न जाऊँ
तुम्हारी दृष्टि के अनन्त में।

~ प्रतीक झा ‘ओप्पी’

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