Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
31 Oct 2025 · 3 min read

पत्रिका समीक्षा

पत्रिका समीक्षा
पत्रिका का नाम: धर्मपथ
अंक: 58, जून 2025
संपादक: डॉ शिव कुमार पांडेय
मोबाइल 79 055 15803
उप-संपादक: कुमारी प्रीति तिवारी
मोबाइल 831 8900811
संपर्क: उमाशंकर पांडेय
मोबाइल 945 199 3170
प्रकाशक: उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड फेडरेशन थियोसोफिकल सोसायटी
समीक्षक: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451
🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂
आध्यात्मिक पत्रिका धर्मपथ का अंक 58, जून 2025 इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इसमें संपादक डॉक्टर शिव कुमार पांडेय के चार ऐसे लेख हैं, जिन्हें अत्यंत गूढ़-गंभीर प्रकृति का कहा जा सकता है। इनमें सृष्टि के रहस्यों की खोज-पड़ताल है। यह लेख उनके लिए हैं, जो सृष्टि के अज्ञात रहस्यों और गुप्त शक्तियों के संबंध में अनुसंधान के उत्सुक हैं।

पहला लेख शंकराचार्य के बारे में है। कुछ विद्वान शंकराचार्य को आठ सौ ईसवी का मानते हैं, लेकिन मैडम ब्लैवैट्स्की और टी. सुब्बाराव की मान्यताओं का अनुसरण करते हुए लेखक ने शंकराचार्य को पॉंचवीं शताब्दी ईसा पूर्व का माना है। इसका आधार वेदांत सूत्र, विवेक चूड़ामणि तथा उपनिषद और गीता पर शंकराचार्य के कार्य हैं। शंकराचार्य के कार्यों का अभी भी मूल्यांकन होना शेष है। मैडम ब्लैवैट्स्की को उद्धृत करते हुए लेखक ने बताया है कि शंकराचार्य के कुछ मूल ग्रंथ उनके मठ में सुरक्षित हैं,जिनके समझने के लिए शंकराचार्य के मठों में विशेष दीक्षाऍं भी होती हैं।

“प्राण तत्वों का रहस्य” शीर्षक से शरीर में उपस्थित प्राण के कार्य पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है । लेख बताता है कि जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो प्राण अपने मूल स्रोत को वापस लौट जाता है। पूर्णता की पकड़ खो देता है और एक रासायनिक क्रिया के अंतर्गत अंशों और अणुओं से बॅंध जाता है। लेखक ने बताया है कि गूढ़ विद्या के अनुसार जीवन तत्व अथवा प्राण के जीवन-अणु कभी भी पूरी तरह नष्ट नहीं होते। रहस्य की एक बात यह भी है कि जीवन तत्व के जीवन-अणु पिता से पुत्र में अनुवांशिकता के रूप में प्रेषित होते हैं तथा आत्मीयता और कर्म के नियम द्वारा विभिन्न शरीरों की एक श्रृंखला में एक ही व्यक्ति की ओर खिंच कर आ जाते हैं । थिओसोफी का उपरोक्त दर्शन प्राण-तत्व और पुनर्जन्म की रहस्यमयी गुत्थी को सुलझाने के कार्य से इस प्रकार अभिनव रूप से जुड़ जाता है। लेख और भी गहरी खोज-पड़ताल की मॉंग कर रहा है।

गंधर्व देवता आदि के बारे में सब ने सुना है। लेख में इन्हें ध्वनि का देवता बताया गया है। दिव्य देवदूत और संगीतकार कहा गया है। लेखक का कहना है कि संगीत ही देवताओं के साम्राज्य की सामान्य भाषा है। संगीत के माध्यम से ही मनुष्य देवताओं की दुनिया को समझ पाएगा। लेख कहता है कि देवता हम मनुष्य द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के माध्यम से नहीं, अपितु ध्वनि और संगीत के माध्यम से एक दूसरे से बात करते हैं। लेख भाषा के स्तर से ऊपर उठकर संगीत, ध्वनि और हृदय की भाषा के महत्व को स्थापित कर रहा है।

“कुमारों का रहस्य” शीर्षक से लेख उस सनातन विचार को चर्चा के केंद्र में ला रहा है, जिसमें सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार_ इन चार कुमारों का उल्लेख मिलता है। लेखक ने इन कुमारों को परम तत्व से सीधे उत्पन्न हुए बताया है। मैडम ब्लैवैट्स्की की पुस्तक द सीक्रेट डॉक्ट्रिन में भी इन कुमारों की चर्चा का लेख में उल्लेख है। थिओसफी के परम विद्वान लेडबीटर साहब को उद्धृत करते हुए लेख में बताया गया है कि सनत कुमार शुक्र ग्रह से आए देवताओं में से एक थे। आश्चर्यजनक रूप से कुमार को सोलह ग्रीष्म काल का शाश्वत युवा बताया गया है। लेख में एक अन्य स्थान पर यह भी बताया गया है कि साधकों को प्रगति के एक निश्चित बिंदु पर पहुंचने के उपरांत संसार के भगवान के सामने प्रस्तुत किया जाता है। लेख में बताया गया है कि थिओसोफिकल सोसायटी की संस्थापक मैडम ब्लैवैट्स्की की संसार के भगवान के सामने मुलाकात हुई थी। वह एक युवक थे लेकिन उनमें ऐसी शक्ति थी कि उनकी दृष्टि को मैडम ब्लैवैट्स्की भी सहन नहीं कर पाईं और उन्होंने अपने चेहरे को ढक लिया था।

लेख के अंत में अथवा कहिए कि पत्रिका के अंतिम वैचारिक पृष्ठ के अंतिम पैराग्राफ में यह ठीक ही कहा गया है कि इन महागुरुओं अथवा ईश्वर-पुत्रों के माध्यम से ही नवजात मानवता ने अध्यात्म-ज्ञान की पहली शिक्षा ग्रहण की और यह वही रहस्यमई ज्ञान-धारा है जो हमारे वर्तमान छात्रों और विद्वानों को कठिन उलझन में डालती है।
वास्तव में पत्रिका अध्ययन से अधिक मनन की अपेक्षा कर रही है। बार-बार पढ़ने पर हम कुछ बिखरे हुए सूत्रों को शायद पकड़ सकें।

Loading...