आत्मचिंतन
इंसान को पता नहीं होता कि वह कितना सही है और उसमें कितनी सामर्थ्य है। जब समय विचारों में उलझने के बजाय मंज़िल की ओर बढ़ने का होता है, तब वही विचारों का दलदल उसे बाँध लेता है। मानवीय विकारों से ग्रसित मन अपने अस्तित्व को खो देता है। संवेदना का गलत प्रयोग शायद उसे इतना दबा देता है कि उसकी प्रतिक्रिया भी उल्टी हो जाती है।
कभी-कभी लगता है कि वह बहुत मज़बूत है — तमाम परिस्थितियों को झेल सकता है, उनसे दो-दो हाथ कर सकता है। पर कभी-कभी उतना ही कमजोर और असहाय हो जाता है। क्या करे? कैसे करे? कहाँ जाए? किससे मदद मांगे — कुछ समझ नहीं आता। उसे नहीं पता कि जीवन की कसौटी पर वह कितना खरा उतरेगा। शायद अकेलेपन से ग्रसित यह मन तमाम कुंठाएँ बनाता और तोड़ता रहा है, और अंततः निष्ठुर तथा स्थितप्रज्ञ बन गया है। जड़ता की स्थिति आ गई है — जीवन की गतिशीलता समाप्त हो गई है।
दुखों के समुद्र में अकेला फँसा यह मन स्वयं को कैसे संभाले — यह उसे भी ज्ञात नहीं। परिस्थितियों का भान होते हुए भी वह ऊर्जावान नहीं रह पाता।
कभी-कभी उसे लगता है कि उसकी सारी संवेदना मर गई है — जैसे वह ज़िंदा लाश बनकर रह गया हो। संकल्प शक्ति होने के बावजूद भी लक्ष्य भेदन नहीं कर पाता। वह स्वयं से हार गया है, और शायद अब एक काठ की पुतली बन गया है जो दूसरों के इशारों पर नाच रही है।
मन-मस्तिष्क में तमाम विरोध होने के बावजूद भी उसमें प्रयोगवादी बनने की शक्ति नहीं बची। कभी-कभी लगता है कि वह अपने ही हृदय के विकारों से संचालित हो रहा है — खुशी, ग़म, क्रोध, ईर्ष्या, जीत, हार, आदि सभी तो मानवीय हृदय के विकार ही हैं और शायद अब उनकी सत्ता चरम पर है।
कभी लगता है कि प्रेम की सत्ता सर्वोच्च है — मातृ प्रेम, पितृ प्रेम, स्नेह — ये सब जीवन की तमाम परेशानियों का उन्मूलन कर सकते हैं, जीवन में फिर से गति ला सकते हैं। परंतु अपेक्षित परिणाम न मिलने पर वह टूट जाता है। सामाजिक उपेक्षा सहन करने का ज़ेहन अब नहीं बचा है। सांसारिक कष्ट झेलना बहुत कठिन हो गया है। भीतर की पीड़ा जब आत्मा को झकझोर देती है, तो विश्वास भी टूट जाता है।
फिर भी, संकल्प शक्ति अब भी जीवित है। वह खुद को विश्वास दिलाने की कोशिश करता है, पर शायद पीड़ा से उभरने के प्रयत्न व्यर्थ हो गए हैं। इसका सीधा असर निर्णय क्षमता पर पड़ता है, जो अब लगभग समाप्त हो चुकी है। जब वह स्वयं निर्णय लेता है, तो गलत ठहरा दिया जाता है; और जब दूसरों पर आश्रित होता है, तो वे हाथ खींच लेते हैं। विश्वास का हनन फिर होता है, और वह अंधकार की ओर धकेल दिया जाता है। समय लग जाता है संभलने में, निकलने में, फिर से खुद को विश्वास दिलाने में। और तभी जड़ता फिर से समा जाती है।
समय रहते उचित सफलता न मिलने से नकारात्मक कुंठाओं का जन्म होता है। मन अमावस्या के अंधेरे से भी गहरे अंधकार में डूब जाता है।फिर वह स्वयं में विश्वास जगाता है, आगे बढ़ता है, कोशिश करता है, सफलता भी मिलती है —पर खुशी नहीं, संतुष्टि नहीं। एक झूठी मुस्कान बस चेहरे पर रह जाती है। जिंदगी बस निराशा और आशा के द्वंद्व में उलझी रह जाती है। फिर भी वह कोशिश जारी रखता है — जीवन के मर्म को समझने की, सत्य को जानने की, और आत्मा की उस शांति तक पहुँचने की जो सब पीड़ाओं के पार है।
जीवन का सत्य यही है कि हम जितना बाहर की दुनिया को समझने में व्यस्त रहते हैं, उतना ही भीतर की दुनिया को अनदेखा कर देते हैं। हम अपनी संवेदनाओं को दबाकर यह मान लेते हैं कि हम मज़बूत हैं, जबकि असल में वही दबे हुए भाव एक दिन हमें भीतर से खोखला कर देते हैं। “आत्मचिंतन” हमें यह सिखाता है कि हर पीड़ा, हर असफलता और हर जड़ता —आत्मज्ञान की दिशा में एक सीढ़ी है।जब इंसान अपने भीतर की निष्ठुरता को पहचान लेता है और संवेदना के सही अर्थ को समझने लगता है,तभी वह जीवन के वास्तविक आनंद को अनुभव कर पाता है।
मन का मंथन ही आत्मशुद्धि का मार्ग है,और यही आत्मचिंतन —एक टूटे हुए मन को फिर से पूर्णता की ओर ले जाता है, जहाँ न निराशा शेष रहती है, न भय
— बस एक नई रोशनी होती है, जो भीतर से बाहर तक सब कुछ प्रकाशित कर देती है।
मौलिक एवं स्वरचित
— स्तुति कुमारी।