कुंडलिया. . . . .
कुंडलिया. . . . .
किसने जाना आज तक, मानव मन का भेद ।
सुख की गागर में करें, अपने ही सौ छेद ।।
अपने ही सौ छेद , सत्य कब मन पहचाना ।
अंतस का विश्वास, छले अब आज जमाना।।
खाकर गहरी चोट , लगे फिर आँसू रिसने ।
इस मानव का भेद , यहाँ पर जाना किसने ।।
सुशील सरना / 31-10-25