Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
31 Oct 2025 · 3 min read

नाक रगड़..!!

व्यंग्य
नाक रगड़ना

टीचर:दीवार पर खड़े हो जाओ।
बच्चा खड़ा हो गया।
टीचर: नाक रगड़ो
बच्चा क्या न करता। नाक रगड़ने लगा।

एक दो शरारती बच्चे इस पुनीत पावन क्रिया को जमीन पर दोहरा रहे थे। धरती माता धन्य हो रही थी। बाल मानव योनि अमृत प्रसाद चख रही थी। दीवार पर भी यही दृश्य था। सूक्ष्म अमृत कण शरीर में जा रहे थे। बेफिक्र टीचर सलाई में फंदे डाल रही थी। 11 नंबर की सलाई में फंदे डालने का अपना ही मजा था तब।
न किसी बच्चे की नाक कटी। न खबर बाहर आई। नाक अवश्य लाल थी। बाद में ठीक हो गई। बच्चे बड़े हुए तो नाक लंबी हो गई। नाक फूलने लगी। ऊंची होने लगी। नाक नीची न हो, इसके जतन करने लगी। नाक को नाक रगड़ना मंजूर न हुआ।
दलगत राजनीति के लोग बताते है, दुनियाभर में नाक रगड़ाई जाती है। वहां यह प्रथा है। भारत में सजा। अरब में सर्वाधिक नाक रगड़ाई जाती है। उसके बाद पाकिस्तान में। पाक तो जब तब नाक रगड़ता ही रहता है।
भारत में शिक्षा पद्धति में बदलाव हुआ। नाक रगड़ना मुहावरा रह गया। प्रैक्टिकल एग्जाम बंद हो गये। नई-नई टीचर टीम इंडिया में आ गई। एक्सपर्ट टीचर रिटायर हो गई। नाक रगड़वाने का हुनर उनके साथ चला गया। कुछ सरकार ने सख्ती कर दी।

2025 में इस मुहावरे की वापसी हुई। जिंदा कौमें हर वक्त जिंदा रहती हैं। एक नेता जी ने एक व्यापारी से नाक रगड़वाई। नेता जी के दिमाग में “यह पुरानी कला” कहां और कैसे विकसित हुई? कहना मुश्किल है। हो सकता है, उन्होंने इस कला को सुना हो? हो सकता है, भोगा हो? हो सकता है, इनोवेशन किया हो? ( वैसे नेताजी की उम्र देखकर लगता नहीं, उनके युग की बात होगी। अब तो यह लोप मुद्दा सॉरी सजा है।)
व्यापारी ने नाक रगड़ी। आखिर क्या करता? प्राकृत क्रिया दोहराई गई। पार्टी की नाक नीचे हो गई। हंगामा हुआ। पार्टी के नेता अपने ही मंत्री पर बोलने लगे। मंत्री सफाई देते रहे..”मेरा उससे क्या मतलब? मुझसे तो रोज हजारों लोग मिलते हैं?” करामात देखिए। केक हाजिर हो गया। एक बड़े नेता बोले..धाराएं हल्की लगी हैं। बड़ी करो। पुलिस ने बड़ी कर दी।
अब खलबली मची। नाक बचाने पर गोल मेज सम्मेलन हुआ। दोनों पक्षों के लोग बैठे। दिग्गजांचल के नेताओं ने समझौता कराया। कोई गिला शिकवा नहीं। न रंगदारी मांगी गई। न धमकी दी गई। धाराएं कम कर दो। नाक का सवाल पार्श्व में चला गया।
किसी पक्ष ने नाक पर नोंक नहीं आने दी। यानी नाक की बरसों पुरानी सज़ा फिर लुप्त हो गई। नाक ऊंची हो गई। ख़बरनवीसों की नाक नीचे हो गई। “ऐसा तो कुछ हुआ ही नहीं”। सबकी नाक अपनी जगह है। न घिसी न कम हुई। इसे कहते हैं सियासत। खुद धारा बढ़ाई। खुद हटवाई।
नाक का क्या? वह कहां से साबित करे..उसको जमीन पर रगड़ा गया। अगर रगड़ा तो बताओ..कितनी घिसी?
नाक तो नाक है। उसका काम सूंघना है। सांस लेना है। सांस है तो नाक है। वरना उसकी क्या बिसात? नाक के नीचे नाक है। तभी नाक के बाल दिखाई नहीं देते। जैसे ही बढ़े..कट।

सूर्यकांत

Loading...