Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
31 Oct 2025 · 1 min read

बेवजह यूँ न हमको सजा दीजिए

एक निर्धन व्यक्ति उन धनवान लोगों से क्या कह रहा है जो कभी किसी निर्धन की मदद नहीं करते अपितु उन्हें हीन भावना से देखते हैं और आए दिन उनपर तरह -तरह के अत्याचार कर सताते रहते हैं।आप सबके समक्ष प्रस्तुत है मेरी एक रचना-

देना ही है गर तो दुआ दीजिए।
बेवजह यूँ न हमको सजा दीजिए।।

अपमान सहकर जी न पाएंगे हम।
सह नहीं पाएंगे अब जुल्मों- सितम।
पीठ पे और खंजर चलाओ नहीं।
नाहक ही मेरा घर गिराओ नहीं।

दोष क्या है? हमारा बता दीजिए।
बेवजह यूँ न हमको सजा दीजिए।।

खुशियाँ छीनकर खुश न रह पाओगे।
तुम भी एक दिन आँसू बहाओगे।
देख दयनीय स्थिति हँसते हो हमपर।
एक दिन हँसेंगे सभी लोग तुमपर।

नेह हम पर भी कुछ बरसा दीजिए।
बेवजह यूँ न हमको सजा दीजिए।।

शत्रुता व्यर्थ हमसे निभाते हो क्यों?
बेवजह सितम हम पे ढाते हो क्यों?
हमनें मित्र क्या है?बिगाड़ा तुम्हारा।
किस गलती पर तुमने हमको मारा।

नाहक ही तीर यूँ न चला दीजिए।
बेवजह यूँ न हमको सजा दीजिए।।

निर्धन ही सही हम भी इंसान हैं।
तुम्हारी तरह मुझमें बसे प्रान हैं।
बली का बकरा बस समझते हो क्यों?
क्रूर बन सर तलवार धरते हो क्यों?

दीवारें नफरत की गिरा दीजिए।
बेवजह यूँ न हमको सजा दीजिए।।

हमको भी चैन से रहने दीजिए।
हमें कार्य अपना करने दीजिए।
बेवजह ही हमको सताते हो क्यों?
गिरे को और भला गिराते हो क्यों?

दीप घर का न मेरे बुझा दीजिए।
बेवजह यूँ न हमको सजा दीजिए।।

स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

Loading...