Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
31 Oct 2025 · 1 min read

ऐसी सुबह जिसमें मैं न रहूं

ऐसी सुबह जिसमें मैं न रहूं

कवि — मुकेश शर्मा

ब्रह्ममुहूर्त की पहली किरण में,
जागा मन एक नयी उमंग में।
शीतल मंद सुगंधित पवन,
छू गया तन — ज्यों स्नेहिल स्पंदन।

पथ पर चला अकेला मैं,
धरती की गोद में खोया मैं।
हर कदम पे प्रकृति का संगीत,
मन में गूंजे मधुर प्रगीत।

दूर कहीं एक शिला मिली,
वहीं बैठा, आँखें मूँद ली।
श्वास में जीवन, मौन में शांति,
क्षणभर में मिट गयी भ्रांति।

सोचा —
“ऐसी सुबह जिसमें मैं न रहूं,
वह कैसी होगी, कौन कहूं?”

यह वृक्ष रहेगा, ये पत्ते झरेंगे,
ये पंछी गाएँगे, नभ सजेंगे।
शिला यही रहेगी अडिग यहाँ,
पर मैं न रहूंगा इस जहाँ।

फिर भी क्या मैं सचमुच न रहूंगा?
या हवा के संग कहीं बहूंगा?
पत्तों की हर सरसराहट में,
अपनी ही गूंज सुनूंगा।

न होने में भी एक होना है,
मिटने में भी एक खोना है।
सुबह वही होगी, रूप नया होगा,
मैं नहीं, पर मेरा अहसास जिया होगा।

यही है जीवन का शाश्वत सत्य —
आना-जाना बस एक पथ।
हर प्राणी अपनी सुबहें जीता,
फिर अगली सुबह प्रकृति को देता।

इसलिए आज की यह प्रभात,
लगी मुझे साक्षात बात —
कि जो सच में जीता है यहाँ,
वह कभी मिटता नहीं जहाँ।

Loading...