( यूँ ही-- कुछ फिलासफिकल पंक्तियाँ )
( यूँ ही– कुछ फिलासफिकल पंक्तियाँ )
चम्मच से कटोरी कुछ ख़फ़ा है,
औ प्लेट कटोरी से कटा कटा है।
प्लेट कितना भी बड़ा हो यारो,
थाली का कद कभी न घटा है।
झारे की बदगुमानी का यारो,
कढाई को भी अच्छे से पता है।
बटलोही आग में घिर के भी न डरे
उसके सहारे चांवल पक रहा है।
थाल कटोरी में हो, जो भी व्यंजन,
खानेवाला चम्मच जरूर मांगता है।
और गिलास कहे, खाने के बाद,
प्यास बुझाने मेरा सर झुका है।
मैं बड़ा हूं या दानी तू बड़ा है
आज ये ही अहम मसअला है ।
( डा: संजय दानी )