हर चित हरि का वास है, ढूँढ रहा संसार।
हर चित हरि का वास है, ढूँढ रहा संसार।
कारण कल्मस मन भरा, दिखे नहीं सरकार।।
निर्मल मन रख कीजिए, हरि नाम का जाप।
सहज भाव कर लीजिए, दर्शन प्रभु का आप।।
ईश आपकी भावना, मिले जहाँ विश्वास।
दुर्लभ होता है तभी, जब संशय हो पास।।
घट-घट वासी जानिए, कण-कण करें निवास।
छोड़ जगत में ढूँढना, देखो अपनी साँस।।
सुमिरन कर हरि नाम का, प्रभु पग रखकर ध्यान।
“पाठक” करता कर्म निज, मिले जगत सम्मान।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)