कुण्डलिया
कुण्डलिया
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मुश्किल से कटता कभी, है अपना एकांत।
मन भी कहीं लगता नहीं, रहता बहुत अशांत।
रहता बहुत अशांत, उदासी के आलम में।
जीवन का आनंद, मिले न अकेलेपन में।
कहते वैद्य सुरेन्द्र, मुहब्बत कर लें दिल से।
साथी लें प्रिय ढूंढ, मिलेगा हल मुश्किल से।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य