इंसानियत के भाव
भाव सिर्फ सोने के नहीं बढ़े,
भाव अब इंसानों के भी बढ़ गए हैं,
चेहरों पर मुस्कान वही पुरानी,
मगर दिलों में नए फ़ितूर चढ़ गए हैं।
अब रिश्ते भी बाजार में बिकते हैं,
कीमतें उनकी भी तय हो गई हैं,
जो सच्चे थे, वो किनारे हो गए,
सारी ईमानदारी, व्यय हो गई है।
सच बोलने वाला अब अकेला है,
क्योंकि भीड़ झूठ की तरफ झुक गई है,
नफरत की बोली सस्ती है यहाँ,
मोहब्बत की भाषा बहुत महँगी हो गई है।
अब नम्रता को लोग कमजोरी मानते हैं,
और चालाकी को हुनर समझ बैठे हैं,
जो दिल से कुछ करने निकले थे,
वो भी आज दिमाग़ के खेल में पड़े बैठे हैं।
सियासत हो या रिश्तों का खेल,
हर जगह सौदे तय हो रहे हैं,
जो साफ़ दिल वाले थे कभी,
आज वो भी समझौते कर रहे हैं।
अदब अब किताबों में कैद है,
और ज़मीर अब नींद में खो गया है,
हर कोई बस ऊँचा दिखना चाहता है,
भले ही वो खुद की नज़रों में गिर गया है।
अब अच्छाई पर हँसी उड़ाई जाती है,
बुराई को लोग ताली दे रहे हैं,
अब वो दौर गया जब सच्चे को सम्मान मिलता था,
अब तो झूठे ही इनाम ले रहे हैं।
इसलिए ये बात राज़ ही रखना तुम,
क्योंकि सच बोलना अब जुर्म बन गया है,
ये दुनिया अब चेहरों का खेल है,
जहाँ इंसान बहरूपिया बन गया है।
भाव सिर्फ सोने के नहीं बढ़े,
इंसानियत के भी अब भाव चढ़ गए हैं,
और क्या कहें इस ज़माने का हाल,
फरेब करने वाले बहुत ऊपर चढ़ गए हैं।