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30 Oct 2025 · 1 min read

गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं

कदम बढ़ा पीछे हटने वाले नहीं हैं।
गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं।

हमनें कितनों का अहंकार मिटाया है।
दुष्ट अधर्मियों का संसार मिटाया है।
हमारा फरसा शत्रु पर जब भी चलता है।
पल में धड़ से अलग मस्तक को करता है।

बिना विजय रण से टलने वाले नहीं हैं।
गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं।।

सप्तऋषि वंशज नहीं किसी से डरते हैं।
प्राण आहुति देकर धर्म रक्षा करते हैं।
कभी शत्रु के सम्मुख सर नहीं झुकाते हैं।
स्वदेश हेतु हँसकर निज शीश कटाते हैं।

भय खा अस्त्र-शस्त्र धरने वाले नहीं हैं।
गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं।।

वेद पुराण का जग को हमनें ज्ञान दिया।
बहा ज्ञान की गंगा जगत उत्थान किया।
दशमलव देकर जग को गिनती सिखलाई।
जग को प्रथम तारों की भाषा बतलाई।

आरक्षण से प्रगति करने वाले नहीं हैं।
गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं।।

सुश्रुत संहिता लिख रोग का उपचार किया।
ज्योतिष शिक्षा देकर जग का उद्धार किया।
शस्त्र और शास्त्र विद्या के हम ज्ञानी हैं।
अंक जनक रामानुज, भाभा विज्ञानी हैं।

अपयशी इतिहास गढ़ने वाले नहीं हैं।
गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं।।

अंग्रेजों मुगलों से हार कभी न मानी।
मिटा दिए प्रतिपक्षी जब निज भृकुटी तानी।
रण कौशल में हमसा दूजा है न शानी।
सकल कला के ज्ञाता परमगुणी विज्ञानी।

चक्रव्यूह में हम फँसने वाले नहीं हैं।
गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं।।

स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

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