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30 Oct 2025 · 5 min read

वासुदेव छंद विधान सउदाहरण

वासुदेव छंद ,( संस्कृत साहित्य का सम मात्रिक छंद )
चार पद , 14 मात्राएँ ( अठकल ,~ षटकल )
आठवीं मात्रा पर यति लघु मात्रा से,
एवं षटकल का चरणांत दीर्घ मात्रा से
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अठकल का सार्वभौमिक लय सिद्धान्त है –
332. 44. 35.( यह सही अठकल हैं )

पर अबकि बार , आयोजित छंद के #अठकल में भी #बाध्यता है।
कि #अठकल_का_अंत_लघु_वर्ण_से_हो , व #षटकल_का_अंत
#दीर्घ_वर्ण से हो | और यही सतर्कता कुशलता व अनुपालन इस छंद के सृजन का मूल आधार है।
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(वासुदेवक नाम से भी एक छंद वर्णिक है , जो फिर कभी आगे आयोजित करेगे , अभी मात्रिक वासुदेव छंद आयोजित है
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वासुदेव छंद , 14 मात्रा ( अठकल – षटकल 8- 6)
अठकल यति लघु , व षटकल चरणांत दीर्घ

वासुदेव शुभ , छंद मिला |
अठकल – षटकल , भार खिला ||
अठकल यति लघु , वर्णन है |
षट पदांत गुरु , दर्शन है ||

वासुदेव यह , छंद गुनों |
अठकल षटकल , भार बुनों |
अठकल में यति , लघु रखना –
तब पदांत षठ , दीर्घ चुनों |
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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

प्रार्थना –
हे माँ शारद , वर देना |
सभी तिमिर अब , हर लेना ||
दिव्य मनोहर , ज्ञान मिले |
पुष्प सुगंधित , हृदय खिले ||

देवा गणपति , आ जाओ |
विध्न सभी अब, निपटाओ ||
लाए मोदक , भाव भरे |
लिखे छंद यह , नवल हरे ||

छंद महल पर , कृपा करो |
वासुदेव अब , बुद्धि भरो ||
छंद सफल यह , लिख पाएँ |
गाथा लिखकर , हम गाएँ ||

वासुदेव सुत , है विनती |
हो सेवक दल , मम गिनती ||
मेरा स्वारथ , तुम जानो |
मिले चरण रज , बस मानो ||

वासुदेव सुत , कृष्ण रहें |
गोकुल में सब, श्याम कहें ||
नंद गेह शुभ , धाम बना |
यशुदा आँगन , पुण्य घना ||

वासुदेव यह , छंद बने |
बने भक्ति रस , खूब सने ||
छंद सभी यह , गिरधारी |
स्वीकारो प्रभु , अवतारी ||

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

नारद ऋषिवर , हैं ज्ञानी |
जानें हर घट , का पानी ||
तीरथ हैं खुद , पर घूमें |
इनके भू नभ , पग चूमें ||

ब्रह्मा के सुत , कहलाते |
सभी जगह पर , हैं जाते ||
भजन मगन यह , हैं रहते |
श्री नारायण , हरि कहते ||

सभी खबर यह , भी रखते |
सोच विचारक , सब कहते ||
नहीं कहीं पर , यह रुकते |
इन्हें देखकर , सब झुकते ||

कहते नारद , सुखी रहो |
बे मतलब मत , दुखी रहो ||
यह तन नश्वर , है तेरा |
दिवस चार यह , है डेरा ||

जाना है फिर , प्रभु शरणा |
इसीलिए मन, रख करुणा ||
राह दिखे जब , कल्याणी |
चलना उस पर, हर प्राणी ||

किसका है जग , यह दावा |
कौन जलाकर , यह लावा |
लाया है सँग , दिखलाने |
बना अमर अब , सब पाने ||

करते है छल , आपस में |
घोल रहे विष , अब रस में ||
अपना मतलब , सब जाने |
हित अनहित सब, पहचाने ||

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ
मुक्तक –

छंद महल पथ , पहचानो |
सृजन कलम शुभ,निज जानो |
माता शारद , अनुकम्पा –
देगी साहस , यह मानो ||

मनुज चतुर अब, चाल चले |
पड़ें मित्र अब , सभी गले |
दोष रोपकर, किसको दें –
मिलता जब तम , दीप तले |

पिघले पत्थर , बातों से |
चंद्र हँसे शुभ , रातों से |
कपटी रह चुप , बात सुने –
पिघले कभी न , नातों से |

देश कहे सुत , लाल सुनो |
पहले आकर , तथ्य गुनो |
लाज धर्म जब , संकट में –
रक्षण बल पथ, प्रथम चुनो |

मित्र मिले अब, मतलब से |
कहे बात वह , आ सब से |`
यार मदद अब , भी करता –
रिश्ता कायम , रख रब से ||

चार लोग जब , भी मिलते |
श्रेष्ठ बुरे फल , ही खिलते |
होता निर्णय , जब अच्छा –
नहीं वहाँ जन , तब हिलते |

हाल अजब अब , कुछ ज्ञानी |
करते खुलकर , नादानी ||
कपटी गुरुवर, के चेला ~
कहें गुरू अब , तूफानी |

झगड़े झंझट सदा करें |
देखे लम्पट नहीं डरें |
परेशान जन , हैं रहते –
घरवाले ‌ सब , नैन भरें ||

मामा ही जब , षड्यंत्री |
समझे मोहन , सब तंत्री |
कंस मारकर , हर्ष किया –
बनते उद्धव तब मंत्री |

~~~~~~~~~`
वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

हास्य मुक्तक

किसका आकर , कौन यहाँ |
प्रश्न खड़ा अब, मौन यहाँ ||
जिसकी सूरत , थी मीठी –
निकला है वह, नौन यहाँ | 🥰🙏

जिसका सुंदर , था‌ आना |
निकला मेंढक , का गाना |
टर्र-टर्र सब , सुनते हैं-
पकड़े सिर अब , सुल्ताना | 🥰🙏

चला कीट रस , पीने को |
मस्ती के पल , जीने को |
उसकी बोतल , को छीना-
हाथ मारकर , सीने को |🥰🙏

सुभाष सिंघई जतारा
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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

गीतिका (वासुदेव छंद आधारित )

तुमने भी जब , किए गिले |
तभी मुझे नव , गीत मिले |

हो स्पंदन , साँसों का,
लगता तब मन , फूल खिले |

मधुर मुस्कान , छवि तेरी ,
नयन प्यार सुख , लगे किले |

क्या पराग रस , अधर लगा ,
चखते आकर , केश हिले |

अंग-रंग सब , देख रहा ,
एक जगह सब , नूर सिले |

तुझे शिकायत , क्यों मुझसे ,
दिए प्यार फल , सदा छिले |

राज करो तुम , हुक्म चला ,
दिए तुझे अब, सभी जिले |

सुभाष सिंघई जतारा

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ
गीत

कभी न प्रभु दर , जो आते |
नहीं कहीं वह ,सुख पाते ||

लिए शिकायत , जो घूमें |
ठोकर दर-दर , जो चूमें ||
बात सुनाकर , जो रोते |
बोझा मतलब , का ढोते ||

अपना स्वारथ , जो गाते |
नहीं कहीं वह ,सुख पाते ||

अपना नाटक , हैं करते |
अवसर पाकर , घर भरते |
रहता लालच , में बंदा |
खाने तत्पर , हो चंदा ||

घाट- घाट पर , जो जाते |
नहीं कहीं वह ,सुख पाते ||

छलके गागर , जब धरती |
खाली होकर , है घटती ||
कचरा भरकर , इठलाती |
उसकी अक्कल , मर जाती ||

मुख की हरदम , जो खाते |
नहीं कहीं वह ,सुख पाते ||

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

गीत

राम सुधा रस, पीने के |
नष्ट किए दिन, जीने के ||

घूम रहा नर, बौराया |
पागलपन अब , अपनाया ||
अपनों से कर , वह रगड़ा |
उन्मादी पन , के झगड़ा ||

अरमाँ चौपट , सीने के |
नष्ट किए दिन, जीने के ||

अपने तजकर , खलपन से |
हाथ मिलाकर , दुश्मन से ||
अपनों ही पर, वार करे |
अवसर पाकर , खार भरे ||

कर्म मिलें सब , छीने के |
नष्ट किए दिन, जीने के ||

गंदी आदत , को लाया |
भ्रष्ट आचरण , अपनाया ||
सभी कर्म फल , हैं गंदे |
डाल रखे खुद , गल फंदे ||

खाता जूठन , बीने के |
नष्ट किए दिन, जीने के ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

वासुदेव छंद ,मुक्तक

मत बवाल कुछ , किया करो
पावन शुचि जल ,पिया करो
जब भी लेखन , सृजन करें –
शब्दों में तब , जिया करो |

अभिमानी पल , आते है |
पर जल्दी, वह , जाते है |
सोच सदा यह,शुभ रखना –
हर्षित पल सब , पाते है |
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वासुदेव छंद ,गीतिका

राह‌ देखकर , चला करो |
जितना सम्भव , भला करो |

लोग बुलाकर , भ्रमित करें ,
पर तुम निज धुन‌, ढला करो |

राहें भी अब , स्वयं चुनो,
मीठा भी खुद , गला करो |

लोग वाह स्वर , दे जाएँ ,
ऐसी चलकर , कला करो |

छल से छल अब‌ , मरता है ,
दुर्जन को तब , छला ‌ करो |

संकट आकर , जब घेरें ,
बाधाएँ तब , दला करो |

जहाँ जिसे कुछ , दाग ‌मिलें ,
उन्हें रगड़कर , मला करो ,

जहाँ घेरकर , शत्रु चलें ,
दूर सभी तब , बला करो ,

मिलते सज्जन , गुण वाले ,
तब सुभाष शुभ , सला करो |

सुभाष सिंघई जतारा
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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

गीतिका , समांत अहा , पदांत नहीं

जब मेरा पथ , ढहा नहीं |
वर्षा में तब , बहा नहीं |

खेल खेलकर , मत बोलो ,
तासों में अब , दहा नहीं |

वचन जहाँ कटु , है बोला ,
तब प्रभाव कुछ, रहा नहीं |

सभी सुनाकर , प्रश्न जहाँ ,
तुमने अब कुछ , कहा नहीं |

अब “सुभाष” चुप , रहता है ,
ऐसा मंजर , सहा नहीं |

सुभाष सिंघई जतारा

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