अजीजे-दिल होकर भी वो---------- ?
(शेर):- सोचा था हमने कि अब तो हम करीब है, बातें होगी अब तो बहुत।
मगर अब उनको मतलब नहीं हमसे, ख़ता क्या हो गई है हमसे।।
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अजीजे-दिल होकर भी, वो रुसवां हमसे रहते हैं।
करीब इतने होकर भी, वो दिल से दूर रहते हैं।।
अजीजे-दिल होकर भी वो—————-।।
छोड़कर हम अपने दुश्मन, अपनों में आ बसे हैं हम।
मिला नहीं अपनापन यहाँ भी, क्यों पराये हो गये हम।।
भूल क्या हो गई हमसे, बात नहीं हमसे करते हैं।
अजीजे-दिल होकर भी वो—————–।।
शिकायत थी हमको जिनसे, हम दूर जिनसे रहते हैं।
लेकिन वो दुश्मन होकर भी, हमसे बहुत प्यार करते हैं।।
इधर ये अपने होकर भी, हमसे पराये रहते हैं।
अजीजे-दिल होकर भी वो—————-।।
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(शेर):- अब तो अच्छा यही होगा कि छोड़ दूँ , यह शहर सुबह होने तक।
वरना देखकर खामोशी इनकी, चैन हमको यहाँ नहीं मिलेगा।।
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मुझको अब अकेला छोड़ दो, जरूरत नहीं तुम्हारी अब।
अकेला जीने दो मुझको, दिखावा है तुम्हारा यह सब।।
हमें तुम कैसे समझोगे, वहम जो हमपे करते हैं।
अजीजे-दिल होकर भी वो—————–।।
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(शेर):- अब याद आते हैं वो चेहरे, जिनसे कभी करते थे तकरार हम।
कभी वो पूछ ही लेते थे हाल हमारा, अब करते हैं अफसोस हम।।
शिक्षक एवं साहित्यकार
गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला-बारां(राजस्थान)