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30 Oct 2025 · 1 min read

मोबाइल का नशा

लाज-शरम का बिल्कुल भी अब पर्दा नहीं निगाहों पर,
कमर हिलाते मिल जायेंगे, नर-नारी चौराहों पर।

फिल्टर-विल्टर लगा-लगा कर सारे जग को छलते हैं,
लगता है कि चेहरे पर ये रोज चाँदनी मलते हैं।

सोते-जगते, खाते-पीते इतने रूप बनाते हैं,
राजनीति के एक्टर भी इन लोगों से शरमाते हैं।

जिसको कहते आभासी उस दुनिया में खो जाने को,
बेकल है हर व्यक्ति यहाँ जल्दी चर्चित हो जाने को।

नहीं रील से पेट भरेगा, संकट है अब रोटी पर,
जिसे बनाने के चक्कर में चढ़ जाते हैं चोटी पर।

मोबाइल का सिग्नेचर है इनके दिल की फाइल पर,
दर्शक भी तो लगे हुए हैं, सुबह-शाम मोबाइल पर।

खाट, पलँग पर पर लेटे-लेटे अक्सर रील चलाते हैं,
पति-पत्नी अनमोल समय को यूँ ही नहीं गँवाते हैं।

मम्मी-पापा के आदर्शों को अक्सर अपनाते हैं,
मोबाइल में डूब-डूबकर बच्चे ज्ञान बढ़ाते हैं।

सच कहता हूँ मोबाइल यह लगता मुझे अजूबा है,
बच्चा से बूढ़ा हर कोई आज इसी में डूबा है।

मोबाइल का नशा आजकल मदिरा पर भी भारी है,
जानकार कहते हैं इसको, यह भी इक बीमारी है।

मान लिया यह बहुत जरूरी, लेकिन गले लगाना मत,
‘सेहत सबसे ऊपर है’, तुम इसको कभी भुलाना मत।

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 29/10/2025

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