पहली बारिश
पहली बारिश और
मिट्टी की सौदी सौदी खुशबू का आना
पहली बारिश और
मिट्टी का नम हो जाना
पहली बारिश और
खेतो में पानी का आ जाना
पहली बारिश और
किसानो के हल का चल जाना
पहली बारिश और
हरी पत्ति का उल जाना
पहली बारिश और
जंगलो में घनघोर घटा का छा जाना
पहली बारिश और
नन्हे परिंदे का चहचहाना
पहली बारिश और
पशुओ का दौड़ भाग में लगना
पहली बारिश और नन्हे
बच्चों का मिट्टी में खेलने आना
पहली बारिश और
कच्चे रास्तो में पैरो की छाप का आना
पहली बारिश और
नन्हे हाथो का गलियों में नाव बहाना
पहलीं बारिश और
माँ की डांट के साथ दुलार भी पाना.
पहली बारिश और
नदियों का कल कल के संगीत से जुड़ना
पहली बारिश और
सख्त चट्टानों से झरनो की श्वेत शोर का आना
पहली बारिश और
ठंडक भरी ताजगी का अनुभव करना
पहली बारिश और
पर्यटक का सौँर्दयता से जुड़ जाना
कितना सुहाना होता हैं सब कुछ, एक लेखक लिख जाता हैं शब्दो में प्रकृति क़ो।
पर जब वास्तविकता क़ो देखे तो प्रकृति के पास असीमित खुबिया हैं बतलाने क़ो।
तुम जुड़ो प्रकृति क़ो जानो।
केवल सौन्दर्य क़ो नहीं,
वास्तविकता क़ो पहचानो।
उन नन्ही पतियों क़ो
गमले तक ना सहलाओ।
प्रकृति क़ो सौन्दर्य से जोड़ो
तुम पोधे लगवाओ।
बड़े होने पर मिट्टी क़ो बांधे रखते हैं
तुम पेडो क़ो न कटवाओ।
खेतो में पानी आने पर
मेढ के लिए तुम ना घबराओं
न किसी क़ो मारो
ना तुम खुद क़ो मरवाओ।
नन्हे परिंदो की चह चहचहाट
पर ना तुम ठहर जाना।
ढूंढ रहे वो खेतो में अपना भोजन
तुम उनको भोग करवाओ।
तुम नदियों की कल कल पर मत जाना
कब अपना विकराल रूप दिखालाये।
तुम ना अपने कदम बढ़ाना
कब तुम्हे बहा ले जाये।
सख्त चट्टानों की चमक,
तुम्हे बेसक पास बुलाये,
पर तुम न पास जाना
विरह से मिलवाये
झरनों की वो श्वेत बुँदे
जब तुम तुम्हे पास बुलाये
उनसे कहना तुम नादा हो
भवरे हमें डूबाये
बेसक तुम मनमोह लेने वाली हो सौन्दर्यता
पर उनका क्या जो मोहित हैं वास्तविकता से
हम मानव हैं स्वार्थी तुम निस्वार्थ ही रहना
तुम ऐसे ही खूबियों क़ो हमें बतलाते रहना
दीपिका सराठे