मै खो गई हु अविचल में.......
ये नदियों का शीतल पानी
इन पहाड़ो की सुर्ख हवाएं
मानो जैसे आगोश मे
ले रही हो मुझे अपने!!
नदियों की ये कलकलाहट,
मानो गीत गा रही हो कल कल के!!
इन गीतों की गुन गुनाहट से,
मैं खो गई हूँ अविचल मे!!
ये धुप मे तप्ती रेत और
सूर्य की तपिश ले गई हो मुझे यथार्थ मे!!
मानो ऐसे का लग रहा है,
मैं मिल गई हूँ अपनो से!!
काश ये लम्हे यूँ ही थम जाएं,
ममता की इस गोद में
ममता के. इस आँचल मे!!
मैं संयमित हो जाउ अब सरिता की धारा में
दीपिका सराठे