अर्ध और पूर्ण की उलझनों में जीवन का सार
ये राते और सर्द हवाएं
मानो जैसे जन्नत हो
ओर राहों के ये चंद अंधेरे
मानो जैसे कुर्बत हो
ओर राहो की उलझनों में सुलझते हुएब
जब मैं अपनी भावनाये लिखू…।
जब लिखू पूर्ण चंद्र तो
मैं पिता क़ो संसार लिखू
ओर जब लिखू पूर्ण चांदनी
तो माँ की गोद लिखू
ओर जब लिखू पूर्ण शुक्र तारे
तो में भाई का दुलार लिखू
जब लिखू पूर्ण गंगा तो
मैं बहन का त्याग लिखू
जब लिखू अर्ध सूरज तो
मैं अपना संसार लिखू
जब लिखू पूर्ण लालिमा तो
मैं अपने जीवन का सार लिखू
जब अर्ध लिखू तो लिखू प्रेम
ओर पूर्ण लिखू तो विवाह
जब अर्ध लिखू तो लिखू स्वयं क़ो
ओर पूर्ण लिखू मैं तुमक़ो
दीपिका सराठे