नारी अपमान – एक अप्रत्यक्ष अपराध
नारी अपमान – एक अप्रत्यक्ष अपराध
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समाज में महिलाओं की गरिमा और सम्मान पर चोट पहुँचाने के अनेक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप देखने को मिलते हैं। शारीरिक हिंसा और अपराध तो स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, लेकिन शब्दों और टिप्पणियों के माध्यम से किया गया अपमान भी कम खतरनाक नहीं है। अफसोस यह है कि इस अप्रत्यक्ष अपराध को समाज और कानून अक्सर हल्के में ले लेते हैं।
शब्दों की चोट – अदृश्य हिंसा
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नारी वर्ग को अपमानित करने वाले संबोधन और टिप्पणियां सीधे-सीधे उत्पीड़न का प्रमाण हैं। ऐसे शब्द स्त्री के आत्मसम्मान को भीतर तक घायल कर देते हैं। मानसिक और भावनात्मक स्तर पर यह चोट कई बार शारीरिक हिंसा से भी अधिक गहरी होती है। परंतु चूँकि यह अदृश्य होती है, इसलिए समाज इसे महत्वहीन मानकर नज़रअंदाज़ कर देता है।
. सामाजिक विडंबना
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विडंबना यह है कि अपमानजनक टिप्पणियों और संबोधनों को सामान्य मज़ाक, हंसी-ठिठोली या तंज़ समझ लिया जाता है। नतीजा यह होता है कि महिलाएँ चुपचाप सहन करती रहती हैं और धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन प्रभावित होता है। समाज की यह चुप्पी और उपेक्षा इस अपराध को और गहराई से जड़ें जमाने का अवसर देती है।
कानून और जागरूकता की आवश्यकता
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कानून का दायरा केवल शारीरिक उत्पीड़न तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मानसिक उत्पीड़न, शब्दों से किया गया अपमान और स्त्री की गरिमा पर आघात को भी गंभीर अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाना आवश्यक है। साथ ही, समाज को भी यह समझना होगा कि सम्मान केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं होता, बल्कि स्त्री के अस्तित्व, व्यक्तित्व और भावनाओं की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जब तक नारी के प्रति शब्दों और व्यवहार के स्तर पर गरिमा और संवेदनशीलता नहीं आएगी, तब तक सच्चे अर्थों में नारी सुरक्षा और समानता की परिकल्पना अधूरी ही रहेगी। नारी का सम्मान हर स्तर पर – शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक – किया जाना ही एक स्वस्थ और संवेदनशील समाज की पहचान है।
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद