साहित्य की सियासत
व्यंग्य
साहित्य की सियासत
महफिल जमी थी। सब अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। किसी को किसी में कोई दिलचस्पी नहीं। बीच बीच में कोई ताली बजा देता। वाह वाह कर देता। बस। यह अदब की महफिल थी। अगल बगल कानाफूसी करते लोग। टांग तोड़ते लोग। टांग खिंचाई करते लोग। टांग फैलाते लोग।
नेता खुलकर सियासत करते हैं। डंके की चोट पर करते हैं। प्रोफेशनल हैं। उनके प्रोफेशन का आदर्श वाक्य है…”आगे मत बढ़ना। टांग तोड़ देंगे।” यहां कोई सगा नहीं। दगा ही दगा। ऐसा ही साहित्य है। यहां अनुप्रास की कमी नहीं। सियासत, साहित्य, साजिश, समाज सब कुछ मिलता है। तभी तो, साहित्य समाज का दर्पण है।
यहां सियासत ही सियासत है। नेताओं से भी ज्यादा । यहां टांग फैलाने का स्कोप है। टांग खींचने के लिए खुला मैदान है। कभी भी, कहीं भी, किसी की टांग टूट सकती है।वो तोड़ी जा सकती है। साहित्यिक ग्रुप, साहित्यिक प्लेटफार्म, साहित्यिक संस्थाएं, साहित्यिक पत्रिकाएं, साहित्यिक सम्मान कहीं भी देख लो। शब्द शब्द बूंदी का रायता है।
किसी को पुरस्कार मिला। किसी की पुस्तक छपी। किसी को रॉयल्टी मिली।” क्यों मिली?” “ऐसा क्या है उसमें? ‘ “उसको तो लिखना भी नहीं आता। ‘ बस। यहीं से रावण के पुतले में लगे पटाखे फूटने लगते हैं। एक तीर आकर लगता है। रावण जल जाता है।
बे-बेहर की गजलें आलाप करने लगती हैं। छंद छल करने लगते हैं। दोहा दुलत्ती मारता है। मुक्तक कहता है..इसको मुक्त कर दो। गीत रोता है। निबंध बंध लगाता है। लेख साजिश रचता है। जो जितना विद्वान होगा। उतनी सियासत करेगा। राजनीति का खून हमारी रग रग में है। नेताओं को कोसते हैं। उनकी चादर ओढ़ते हैं। यहां सम्मान की चादर है। लेकिन कटी और फटी। साहित्यिक सम्मान यहां तिकड़म से मिलते हैं। भाषा के उत्थान में ऐसे श्रीवृद्धि करते हैं। कोई किसी से खुश नहीं। गली गली। हर मंच पर दिनकर निराला हैं।
आपको मात्रा लगानी नहीं, तोड़नी भी आनी चाहिए़।इसलिए सब जगह उस्ताद हैं। जैसे छोटी छोटी पार्टियां हैं। वैसे ही विद्वानों के दल हैं। हर बड़े लेखक के आगे, पीछे और दिल में राजनीति है। जो दिखता है। वो हकीकत नहीं है। जो नहीं दिखता वो हकीकत है।
यहां स्वयंभू उपाधियां मिलती हैं। बिकती हैं। ई सर्टिफिकेट मिलते हैं। लंबा कारोबार है। ये प्रमाणित करते हैं…”आप साहित्यकार” हैं। फर्जी डिग्रियां चुटकी बजाते मिलती हैं। महिलाओं के लिए आरक्षण है। कई विंडो सिस्टम है।
साहित्य राजनीति की पाठशाला है। नेता यहां मुख्य अतिथि बन कर आते हैं। खुद चले जाते हैं। अपना दुश्शाला छोड़ जाते हैं। जैसे पॉलिटिक्स में किसी को “राजनीति करना नहीं आता।” वैसे ही आज साहित्यिक जगत में किसी को “लिखना” नहीं आता। मुश्किल यही है। हम राजनीति को कोसते हैं। लेकिन उसको ही ओढ़ते हैं। टांग खींचो मगर इतनी भी नहीं कि साहित्य और हिंदी का मेरुदंड टूट जाए।
“मैं कहीं कवि न बन जाऊं, तेरे प्यार में ऐ कविता।”
सूर्यकांत
27.09.2025