ज़िंदगी से निराश रहते हो
ज़िंदगी से निराश रहते हो
किसलिए तुम उदास रहते हो
बात जब भी करो मुहब्बत की
प्रश्न करते पचास रहते हो
हम तुम्हारी समझ गए फितरत
तुम तो कुर्सी के खास रहते हो
कैसे तुम कड़वे घूंट पीकर भी
बांटते बस मिठास रहते हो
काम के नाम पर यहां तो तुम
काटते सिर्फ घास रहते हो
हर समय दिल को ऐसा लगता है
तुम मेरे आसपास रहते हो
‘ अर्चना’ जान लो जरा सच भी
क्या लगाते कयास रहते हो
डॉ अर्चना गुप्ता
25.09.2025