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26 Sep 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . . स्वप्न

दोहा पंचक. . . . . स्वप्न

स्वप्न सभी होते नहीं, जीवन में साकार ।
कुछ तो टूटें भोर में, कुछ तोड़े संसार ।।

जीवन अद्भुत स्वप्न सा, कुछ पल का ठहराव ।
पर यथार्थ में जिंदगी, सहती अनगिन घाव ।।

स्वप्न सरीखी जिंदगी, स्वप्न सरीखा रूप ।
संग रैन के स्वप्न ढले,संग स्वप्न के धूप ।।

ऊँचा उड़ने के लिए, स्वप्न जरूरी यार ।
स्वप्न सदा ही खोलते , आशाओं के द्वार ।।

जब तक चलती जिदंगी, सपने चलते साथ ।
जीवन मेें यह स्वप्न ही, चमकें जैसे पाथ ।

सुशील सरना / 26-9-25

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