द्वंद्व- एक मीठा संघर्ष!
यूं तो लोग कहते हैं इसे मानसिक उलझन,
लेकिन नहीं, ऐसा तो नहीं है —
इस स्थिति में भी है एक अपनापन।
लगता है किसी विचार की छटपटाहट
दम तोड़ देगी दीवारों के बीच,
किंतु होता है सबकुछ इसके विपरीत।
निश्छल मन के मज़बूत स्तंभ हैं विचार,
और द्वंद्व है विचारों की श्रेष्ठता की लड़ाई।
उज्ज्वल होता है बौद्धिक ज्ञान,
वही करवाता है आपके विचारों को स्नान।
दुर्बल विचार बीच में ही कर जाते हैं पलायन,
तर्कों की तलवार से खंडित होते हैं प्रतिक्षण।
फिर खुल जाती हैं गांठें भ्रम की,
धुल जाते हैं विकार मन के।
जोर-शोर से जब चलती है खींचम-खींच,
तब वह मन को करता है रोमांचित।
निष्कर्ष तक पहुंचने को बेचैन द्वंद्व,
विचारों के समंदर में लगाता है कश्त।
कुछ देर तक यूं ही चलती है बेचैनी,
विचारों की जैसे चल रही हो मनमानी।
सबके अपने थे तर्क सबका अपना अलग था फसाना,
मन इस अबूझ पहेली से था अनजाना।
कशमकश निरंतरता बनाए चल रही थी,
आखिर गहन चिंतन की उसकी यह पहली पहल थी ।
व्यक्तित्व निर्माण में इसकी भी
होती है अहम भूमिका,
विचारों का मंथन सिखाता है,
जीवन जीने का सलीका।
बौद्धिक विकास का परिचायक है यह द्वंद्व,
त्रुटियों से बचाता है यह हर पल, हर क्षण।
रखता हर वक्त ख्याल आपके मान का,
हजार मौके देता आपको सुधार का।
द्वंद्व — एक मीठा संघर्ष,
मन में विचारों की लड़ाई का,
जो ले जाए आपको सत्य के प्रकाश में,
जहां दिखता है साफ मन का दर्पण।
जिसमें सभी विचारों का हो जाता है मिश्रण,
जो कर देती है एक मजबूत चिंतन का गठन।
फिर धुल कर, साफ-सा निर्मल
एक विचार लेता है जन्म,
और करता है सभी द्वंद्व का अंत।
आपकी योग्यता दर्शाती है उसे पथ,
तभी तो निकलता है एक उचित निष्कर्ष —
द्वंद्व का मीठा संघर्ष,
जीवन के भरता है दर्प ।