रास्ते : क़ाश ये कुछ बोल पाते....!
” ये रास्ते हैं…
सब के लिए…!
तुम चल सको, तो चलो…
दौड़ सको, तो दौड़ो…!
इसके पास कोई भेद नहीं…
ये मौन है, कुछ कहता भी नहीं…!
सफलता और असफलता के द्वंद लिए…
तेरे-मेरे कदमों के चाल की परख लिए …!
काश़…
रास्ते भी बोल पाते…
उनके पास भी कुछ शब्द होते…!
वो परिचय देते…
और बताते अपनी पहिचान…!
वो बताते कि
कहीं मैं भटक तो नहीं गया या गई,
इन रास्तों में अनजान…!
वो मुझे या हमें अवगत कराते कि…
कितने राही यहां से गुज़रे और सफल हुए…!
किसे मिली मंजिल और कितने असफल हुए…!
कितने चल रहें हैं आज भी…
और कितने भटक रहें अभी भी…!
काश…
ये रास्ते चीख-चिल्लाकर, बता पाते कि…
नहीं, ये रास्ता नहीं है तुम्हारे लिए…!
यहां से लौट जा…
कोई और रास्ता है, तुम्हारे लिए…!
काश़ ये रास्ते, मौन न होते…
कुछ बोल पाते…! “