*विदेशों को अगर जाओ, महज दो-चार दिन जाना (हिंदी गजल)*
विदेशों को अगर जाओ, महज दो-चार दिन जाना (हिंदी गजल)
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1)
विदेशों को अगर जाओ, महज दो-चार दिन जाना
न हिंदुस्तान से अच्छा, कहीं रहना कहीं खाना
2)
जहॉं अपमान मिलता हो, तुम्हें संदिग्ध होने का
कभी उस देश का वीजा, नहीं प्रिय बंधु बनवाना
3)
बुरी है चॉंदनी ओढ़ी, विदेशों की बनी है जो
स्वदेशी के सदा खुद को, बने ही वस्त्र पहनाना
4)
विदेशों में बसे जाकर, कमाते सिर्फ मायूसी
बरस सौ बाद लगता है, उन्हें परदेस बेगाना
5)
यहॉं मस्ती भरी गलियॉं, यहॉं के लोग तरसोगे
चलो परदेस बसने को, अगर सब सत्य समझाना
रचयिता: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज) रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451