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26 Sep 2025 · 1 min read

बुझे दीपकों को जलाने की बातें।

बुझे दीपकों को जलाने की बातें।
बहुत हो चुकीं ये दिखाने की बातें।

जिन्हे कुछ भी लेना या देना नहीं है,
वही कर रहे हैं ज़माने की बातें।

जहाँ चार मिलते वहीं हो रहीं हैं,
फलाने की बातें, ढिकाने की बातें।

जिन्होंने तो कटवा दिये कितने जंगल,
वो करते हैं पौधा लगाने की बातें।

भरा मैल जिनके ज़हन में बहुत सा,
बताते हैं गंगा नहाने की बातें।

रुलाने में मशरूफ हैं लोग इतने,
नहीं कर रहे हैं हँसाने की बातें।

राजेश पाली “सर्वप्रिय”

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