ढलने वाली है ये जवानी भी
ज़ीस्त को कह रहा है फ़ानी भी
माँगे है पीरी में जवानी भी
मुझ से दामन उसे छुड़ाना है
मांगता है मेरी निशानी भी
गरचे बिल्कुल नई ये बात नहीं
बात उतनी नहीं पुरानी भी
सच की मूरत बनें वो बैठे हैं
झूठ में है न उनका सानी भी
मुझको तस्लीम उनकी हुश्यारी
उनकों खलती मिरी नदानी भी
लगती आतिश- फिशां तिरी आँखें
और बरसा रहीं हैं पानी भी
मुझको ठुकरा के ये जमाना फिर
सुनना चाहे मिरी कहानी भी
मुझमें बचपन अभी है बाकी पर
ढलने वाली है ये जवानी भी
मुझको तेरा ही ग़म नहीं केवल
मेरे ग़म तो हैं आसमानी भी
खूबसूरत ग़ज़ल का हर पहलू
बहर – तश्बीह भी रवानी भी