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26 Sep 2025 · 1 min read

ढलने वाली है ये जवानी भी

ज़ीस्त को कह रहा है फ़ानी भी
माँगे है पीरी में जवानी भी

मुझ से दामन उसे छुड़ाना है
मांगता है मेरी निशानी भी

गरचे बिल्कुल नई ये बात नहीं
बात उतनी नहीं पुरानी भी

सच की मूरत बनें वो बैठे हैं
झूठ में है न उनका सानी भी

मुझको तस्लीम उनकी हुश्यारी
उनकों खलती मिरी नदानी भी

लगती आतिश- फिशां तिरी आँखें
और बरसा रहीं हैं पानी भी

मुझको ठुकरा के ये जमाना फिर
सुनना चाहे मिरी कहानी भी

मुझमें बचपन अभी है बाकी पर
ढलने वाली है ये जवानी भी

मुझको तेरा ही ग़म नहीं केवल
मेरे ग़म तो हैं आसमानी भी

खूबसूरत ग़ज़ल का हर पहलू
बहर – तश्बीह भी रवानी भी

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