Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
26 Sep 2025 · 3 min read

व्यूअर्स वंदना

व्यंग्य
व्यूअर्स वंदना

प्रिय व्यूअर्स
आप जो भी हो। जहां भी हो। हमारा नमस्कार है। आप अनंत हैं। अखिल हैं। धरती पर तीन प्रकार के प्राणी होते हैं। चर अचर और अगर ( अगर यानी वो न भी आते तो क्या फर्क पड़ता)। तीन प्रकार के दर्शक/पाठक/ व्यूअर्स होते हैं। उत्साहित, उदासीन और ज्वलनशील। उदासीन थंब दिखाते हैं। बाकी के लिए नीचे पढ़िए।

हे व्यूअर्स!
ज्वलनशील वो हैं, जो देखते सब हैं। पढ़ते सब हैं। लेकिन चुपके चुपके। इनकी सब चीजें पर्दे में होती हैं। वे अपनी प्रोफाइल लॉक रखते हैं। मतलब के लोगों से मतलब की बात करते हैं। उनकी पोस्ट पर ही ये कमेंट करते हैं। रूस के तेल से जलते हैं। भुट्टे की तरह भुनते हैं।
इसी क्लास में आपके दफ्तर के कर्मचारी और साथी भी होते हैं। वे आपकी पोस्ट इसलिए देखते हैं ताकि बता सकें..”अरे वो तो पोस्ट ही डालते रहते हैं। कुछ काम तो है नहीं।” जिनको कोई काम नहीं होता। जो खुद कुछ नहीं कर सकते। वे आलोचना करते हैं। आलोचना पर कोई टैक्स नहीं लगता। फ्री है। इससे शरीर की ऊर्जा बढ़ती है। अंदर अंदर उपला जलता रहता है।

व्यूअर्स मेरे!
तीन और भी प्राणी हैं। सत्य, सनातन और अभिवादन। सत्य वाले उपदेश देते हैं। सनातन धर्मी नाचने थिरकने वालों को संस्कृति की याद दिलाते हैं। देखते वे भी हैं। अभिवादन वाले अभिवादन का स्टीकर चस्पा करते हैं। तीन तरह की सोशल नेटवर्किंग है। सीधे कनेक्शन। सीधे रिजेक्शन। सीधे रिएक्शन। कभी कभी इस पर झगड़ा भी हो जाता है। यह अक्सर पॉलिटिकल होता है। पप्पू पर होता है।

हे व्यूअर्स! हे नाथ!!
आपके कई रूप हैं। आप दर्शक हैं। पाठक हैं। श्रोता है। कमेंटेटर ( कमेंट) हैं। वेलविशर हैं। शुभ चिंतक हैं। सोशल मीडिया पर आप छुपे रुस्तम। कार्यक्रमों में आप साक्षात रसिया हैं।आप किसी को भी जमा सकते हो। किसी को भी उखाड़ सकते हो। जैसे। पूरा कवि सम्मेलन हो जाए। आप ताली नहीं बजाते।

वैसे आप जानते होंगे..!
तीन प्रकार के दर्शक होते हैं। नंबर एक, जो सुनने आते हैं। नंबर दो, जो सुनना नहीं चाहते। मगर मजबूरी में आए या लाए गए हैं। जैसे मुख्य अतिथि। अतिथि। विशिष्ट अतिथि। अति विशिष्ट अतिथि। सम्मानित अतिथि। अति सम्माननीय अतिथि। सामाजिक अतिथि। राजनीतिक अतिथि। प्रशासनिक अतिथि। अतिथि की डिग्री पोस्ट पर डिपेंड करती है। जैसा अतिथि। वैसा स्वागत। जितना लगाया। उतना रिटर्न।
तीसरी श्रेणी के प्राणी विचित्र होते हैं। वो सशरीर तो वहां होते हैं। लेकिन दिमाग में दूसरा कवि सम्मेलन चलता रहता है। ये लोग आगे की पंक्ति में बैठते हैं। मुस्कुराते हैं। लेकिन ताली नहीं बजाते। कहने पर भी नहीं बजाते।
आपने शबीना अदीब को तो सुना होगा। अरे। आपने ही तो उनको पॉपुलर और वायरल किया है। उनका शेर सुनिए…
“ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में
अभी क्यों उड़ने लगे हवा में, अभी तो शोहरत नई नई है।”
(यह शेर उन्होंने तीसरी श्रेणी वालों के लिए लिखा है)

माय ओल्ड व्यूअर्स!

याद है आपको। एक बार सरस्वती वंदना हो रही थी। एक दर्शक/ श्रोता खड़ा हुआ..”भाई। तेरे पास यही कविता है। दो साल पहले भी यही सरस्वती वंदना सुनी थी।” कवियों ने यह देख कर नई सुनाई। तो भी हल्ला..” यह बढ़िया न है। वही सुना दे पुरानी वाली।”
व्यूअर्स !!! प्राणियों के प्राण!
सियासत में भी तीन प्राणी होते हैं। संवेदी। लंकाभेदी। और छद्मभेदी। ये पाला बदलते रहते हैं। आज यहां। कल वहां। दिन में लड़ते हैं। रात को गले में हाथ डालते हैं।
आपको क्या बताना प्रभु। आप तो अंतर्यामी हो। आप अपना महत्व नहीं जानते। व्यूअर्स बढ़ाने के लिए कोई जुलूस निकाल रहा है। बेटियां नाच रही हैं। गा रही हैं। रोटी उछाल रहीं हैं। लड़के नदी में डूब रहे हैं। टीवी पर डिबेट हो रही है। लोग झगड़ रहे हैं।
क्यों?
आपके लिए प्रभु। आपके लिए।

सूर्यकांत
26.09.2025

Loading...