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25 Sep 2025 · 1 min read

नींदों को हमने रखा ,ख़्वाबों से बे,ख़बर,

नींदों को हमने रखा ,ख़्वाबों से बे,ख़बर,
सिमटी सी ज़िन्दगी के दायरे थे मुख़्तसर।
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद

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