बदलने का तेरे दुख तो नहीं, पर
ग़ज़ल
बदलने का तेरे दुख तो नहीं, पर
मैं शर्मिंदा हूँ ख़ुद अपने यकीं पर
हमीं लाये हैं गंगा इस ज़मीं पर
किया है बंद भी पानी हमीं पर
किये हैं इतने सजदे उस ख़ुदा को
निशां देखे कोई मेरी जबीं पर
मुझे क़ातिल दिखाना था सो छिड़के
ये ख़ूं के छीटे मेरी आस्तीं पर
नहीं देगा दिखाई साफ़ तुझको
घना कोहरा जो है दिल की ज़मीं पर
उठा लाये हैं हम इल्ज़ाम सारे
सभी इनआम छोड़ आये वहीं पर
हमारे फल ज़माने के लिए हैं
तो बरसेंगे ये पत्थर भी हमीं पर
‘अनीस’ इतने नशे में चूर है वो
कहीं पर हैं क़दम, रस्ता कहीं पर
– अनीस शाह अनीस