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25 Sep 2025 · 1 min read

डमरूघनाक्षरी

‘नटवर’

नटखट नटवर, मटक-मटक कर,
तट पर चलकर, तकत हरष जग।
लटक-लटककर, उछल-उछलकर,
झटक-झटक रज, ठहर-ठहर पग।
पवन मचलकर, लट पर फरफर,
उलझ उलझकर, सरर-सरर भग।
लहर-लहर चल, इत-उत जलभर,
चहक चहक तब, सब वनचर खग।।

पवन

सर सरर सरर, फर फरर फरर,
शहर शहर घर, नभ जग उपवन।
कर फड़ फड़ फड़, दल पत झड़ झड़,
जड़ उखड़ उखड़, बढ़ चल धड़कन।
पट सर न ठहर, रपट रपट कर,
उड़ उड़ फर फर, डगमग पग धर।
रज कण भर भर, इत उत झर झर,
नयन गमन कर, जल बह झरझर।।

वतन

वतन वतन भज, सर पर धर रज,
फहर लहर ध्वज, नगर नगर घर।
पहर पहर रट, झट पट झट पट,
जय कर सरपट, भवन सदन पर।
नव पथ अब गढ़, उठकर नग चढ़,
वदन झलक पढ़, ठहर न चल सर।
डगर डगर पर, शहर शहर हर,
वतन लहर भर, तन मन धन वर।।

-गोदाम्बरी नेगी ‘पुण्डरीक’
हरिद्वार उत्तराखंड

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