कलाधर घनाक्षरी
सावन
देख मेघ छाप व्योम, वारि धूम रोम-रोम,
लोप दोऊ सूर्य-सोम, बाल बोल शोर है।
सर्प राज शीश तान, रेग-रेंग खोल कान,
रात गूंज भेख गान, भावना विभोर है।
घास-पात में उमंग, डाल-डाल रंगी रंग,
देख-देख नैन दंग, कामदेव जोर है।
गीत तीज की बहार, नार ने किया श्रृंगार,
प्रेम-राग बार-बार, वाणी से उचार है।।
-गोदाम्बरी नेगी
हरिद्वार उत्तराखंड