कविता, कवयित्री और स्त्रीलिंग
व्यंग्य
कविता, कवयित्री और स्त्रीलिंग
क से कबूतर। क से कवि। क से कविता। क से कवयित्री। कवयित्री शब्द को भाषा के स्वर्णकारों ने फुर्सत में गढ़ा है। उसका एक एक नग लाखों का है। इसमें नजाकत है। नफासत है। खिलाफत है। बगावत है। सियासत है। इबादत है। कोमलता है। बिजली है। कंपन है। स्पंदन है। सिहरन है। इसलिए लिखने में मात्रा इधर उधर लग जाती है।
वैसे इस शब्द की जरूरत नहीं थी। कवि पुल्लिंग। कविता स्त्रीलिंग। कवयित्री शब्द को टपकाने की जरूरत नहीं थी। यह सौतन जैसा ही है। कविता से काम चल सकता था। लेकिन स्त्री को कुछ अलग सांचे में ढालना था। सो रच दिया। जब के कविता साक्षात उपस्थित हो। तो के कवयित्री की क्या जरूरत। माइक पर कविता आएं या कवयित्री। क्या फर्क पड़ता है। दोनों स्त्रीलिंग हैं। दोनों हमारे माथे का भाल हैं। आप कहोगे.. माथा और भाल एक हैं। तो मियां के कविता और कवयित्री भी तो एक हैं।
स्त्रीलिंग शब्द के साथ बड़ी दिक्कत है। अब कविता कविता सुनाएंगी। संचालक “जी” लगा देता है। वरना भ्रम लाजिमी है। दो दो स्त्रीलिंग के चक्कर में अक्सर लोग मात खाते हैं। मात्रा लगनी कहां है ? “कविता जी” भी गलती कर जाती हैं। कवयित्री शब्द उनको आभूषण के बोझ जैसा लगता है। लेकिन हार भी पहनना है। कानों में बाली भी लटकानी है।
कवि का विलोम है कवयित्री शब्द। स्त्री हमेशा विलोम ही होती है। पुरुष की हर बात काटती है। वह करवे की ऐसी ब्रांडिंग कर देती है कि करोड़ों का राजस्व एक हार में सिमट जाता है। उसका शास्त्र अलग है। अनोखा है। सब शस्त्र उसके आगे नतमस्तक हैं। सब जगह स्त्रीलिंग का खेल है।
एक मिनट के लिए कवियित्री शब्द पर भी गौर कीजिए। छोटी इ की मात्रा जानबूझकर कवि के आगे से हटाई गई है। ताकि लड़ाई न हो। एक बार कवयित्री शब्द हटाकर देखिए। काम आसानी से चल सकता था। लच्छेदार शब्दों के रसिया संचालक यह काम आसानी से कर सकते हैं। उपमा उनसे बेहतर कौन दे सकता है। सुनाने का काम है। महिला से बढ़कर कौन कर सकता है।
“कानपुर से आई कवयित्री लता जी अब कविता पाठ करेंगीं “। इस एक वाक्य में शब्दों का महिला मंडल है कवयित्री, लता और कविता। अब बदल कर देखिए। “कानपुर से आई कविता लता जी कविता पाठ करेंगीं”। अनुप्रास भी हो गया। सुंदर भी। कवि कविता से अलग हो ही नहीं सकता। कवि कविता लिखता है। कवि कविता रचता है। कवि कविता सुनाता है। “क्या शानदार कविता है”। यह शब्द यहां तो चल जाएगा। और कहीं प्रयोग करके देखिए?
कवित्री/कवियत्री/कवयित्री/कवियित्री हम क्या क्या नहीं लिखते। गोया शब्द नहीं जुल्फें हों। उलझ उलझ जाए।
मुश्किल आज यही है। हम स्त्रीलिंग और पुल्लिंग में भटके हुए हैं। दही और कुर्सी का लिंग तलाश रहे हैं। कहीं पर विशेषण की भरमार है। कोई खाली हाथ। बेचारा पुरुष। जमीन पर भी आवारा। ऊपर भी आवारा। आवारा बादल। पागल बादल। निष्ठुर बादल। बादल में ई की मात्रा जोड़ दो। बदरी। क्या नजाकत वाला शब्द बन गया। मेघ और मेघा जैसा। जब ये शब्द बन सकते थे। तो कवि का विलोम कविता क्यों नहीं ?
क से कबूतर। क से कवि। क से कवयित्री। उड़…उड़..उड़। मात्रा कहीं भी लगे। उड़ना आना चाहिए। यही भाषा का कमाल है। जब कविता (जी) साक्षात मौजूद है।तो कवयित्री का क्या काम?
सूर्यकांत
25.09.2025