रहकर इस जहां में, मैं जहां को ना पहचान पाया,
🎼 ग़ज़ल शैली में गीत
मतला
रहकर इस जहाँ में, मैं जहाँ को ना पहचान पाया,
तेरी रहमत का नूर था, उसे भी ना पहचान पाया।
शेर 1
समंदर की गहराइयों में तुझे ही ढूँढता रहा,
तेरे इक क़तरे का भी पता मैं ना पहचान पाया।
शेर 2
डूबकर जीना चाहा तेरे इश्क़ की आग में,
तेरी फितरत का रंग भी कभी मैं ना पहचान पाया।
शेर 3
टूटकर भी टूटने का एहसास ना होने दिया,
हर मुलाक़ात में तुझको मैं फिर भी ना पहचान पाया।
शेर 4
दर्द की सिरहन लिए फिरता रहा सारी उम्र मैं,
तेरी ख़ामोशी की आवाज़ भी मैं ना पहचान पाया।
शेर 5
मुस्कुराहट के नक़ाब में छुपी साज़िशें तेरी,
उन साज़िशों की हक़ीक़त को मैं ना पहचान पाया।
शेर 6
दर्द का दरिया दिया तूने, मगर डूबता ही रहा,
तेरी दुनिया की दास्तान भी मैं ना पहचान पाया।
मक़ता
मुकेश के क़दम हर मोड़ पे यही कहते रहे,
ख़ुद की तसवीर में ख़ुद को भी मैं ना पहचान पाया।
मुकेश शर्मा विदिशा