दोहा पंचक. . . . यथार्थ
दोहा पंचक. . . . यथार्थ
जीवन के संग्राम से, जब थकता इंसान ।
अपनी ही पहचान से, हो जाता अंजान ।।
दम्भी हरदम चाहता, जीवन में बस जीत ।
भूल गया बस कर्म ही, उसके सच्चे मीत ।।
जब तक चलता आदमी, चलते साथ हजार ।
पल में विस्मृत बाद में, करता है संसार ।।
दे देता है जिस्म जब, हर बंधन को मात ।
आदम की आती नजर , फिर जग को औकात ।।
मैं मेरा उन्नत करे, बन्दे का अभिमान ।
बेमानी हर शान हो , जब होता अवसान ।।
सुशील सरना / 24-9-25