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24 Sep 2025 · 1 min read

*कुछ तो ऐसा कर चलो*

कुछ तो ऐसा कर चलो
विधा : छंद धरणी
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कुछ तो ऐसा कर चलो, रहे जगत में नाम रे।
दर्द बांँट लो और का, भला करेंगे राम रे।।

कर्मभूमि है यह धरा, यहांँ कहांँ विश्राम रे।
फल तो मिलता कर्म का, खास रहे या आम रे।।

वक्त यहीं समझो सही, कर ले झटपट काम रे।
मिला अभी मौका तुम्हें,जब तक हुआ न शाम रे।।

साधु संत ऋषि मुनि सभी , दिये यहीं पैगाम रे।
जीते परहित हेतु जो, घर हीं उनका धाम रे।।

__अशोक झा ‘दुलार’
मधुबनी (बिहार)
“रचना स्वरचित एवं मौलिक है/”

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