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24 Sep 2025 · 5 min read

कहानी

कई दिनों से अमीन मुराली के घर का चक्कर लगा रहा था।मुराली बैंक के लोन की क़िस्त भरते – भरते थक हार चुके थे।बैंक से ली गयी रकम से दो गुना जमा करने के बाद भी ऋण चुकता नही हुआ था। बैंक मुराली के विरुद्ध दस हजार का वसूली पत्र कलेक्टर को भेज दिया था जिसकी वसूली तहसीलदार के माध्यम से हो रही थी। बाढ़ से फसल बर्बाद हो जाने की वजह से मुराली पूरा ऋण अदा नही कर सके थे और किसी तरह जोड़-गांठ कर आठ हजार रुपये किस्तों में अमीन को दे चुके थे। अमीन शेष दो हजार रुपए की वसूली के लिए बार बार परेशान कर रहा था।मुराली जब भी अमीन को आते हुए देखते अमीन से छिपते छिपाते कही न कही हट बढ़ जाते थे। सरकार से कब तक बचते एक दिन अमीन ने पकड़ ही लिया।बड़ी चिरौरी मिन्नत के बाद अमीन ने मुराली को दो दिन की मोहलत देते हुए ताक़ीद किया कि यदि शेष ऋण दो दिन में चुकता नही किया तो 15 दिन के लिए वह उसे तहसील के हवालात में बंद करवा देगा।

मुराली एक सफेद बकरा पाले थे जिसे वे बहुत दुलार करते थे।जब वे खेती किसानी से थक हार कर घर लौटते बकरा उनके साथ खेलने के लिए उछलने कूदने लगता।वह कभी मुराली की पीठ रगड़ता कभी बाह । जब तक दो ताड़ मुराली से लड़ा नही लेता मुराली का पीछा नहीं छोड़ता।मुराली उसे बड़ी लगन से पाले थे।उसे हरी – हरी दूब, पीपल की पत्ती, जौ,मटर आदि जी भर कर खिलाते थे।मुराली बड़ी लगन से रत्ती के बीजों(गुंजा, रत्ती) की माला बनाये थे जो बकरे के गले में किसी नई नवेली दुल्हन के मंगल सूत्र की तरह दमकता रहता था।

दूसरे दिन सुबह -सुबह रऊफ चिक मुराली के दरवाजे पर आकर बकरे को सहलाने लगा। बकरा जोर -जोर से मिमियाने लगा।मुराली बकरे की आवाज सुनकर घर के अन्दर से भागते हुए बाहर आये। चिक मुराली को देखकर उठ खड़ा हुआ और मुस्कराते हुए बोला- चचा बकरा बेचेंगे?

नही? मुराली की आवाज में सख़्ती थी।
अचानक मुराली को याद आया कि कल फिर
अमीन आ धमकेगा और यदि ऋण अदा नहीं किया तो हवा-लात में डाल देगा।मुराली मन ही मन सोच रहे थे- हवा तो बहुत देखे हैं उसकी चिन्ता नहीं है, पर लात ! उससे कौन नहीं डरता?

अचानक रऊफ बोला अरे चचा क्या सोच रहे हैं! बकरवा मुझे दे दिजीये।अच्छी कीमत दूँगा।

मुराली बोले क्या दोगें?

पच्चीस सौ रुपये।

तीन हजार से कम पर नहीं दूँगा।

रऊफ अचानक उठकर मुराली की ठुड्ढी पकड़कर बोला -चचा आपका भतीजा हूँ । खुदा कसम सिर्फ़ दो सौ कमाऊँगा,दे दिजीये और अचानक बकरे को गोद में उठाकर तौलने के अन्दाज में बोला देखिये पच्चीस किलों भी नहीं होगा।

मुराली को इस तरह रऊफ द्वारा बकरे को तौलना अच्छा नही लगा पर मन ही मन वे बकरे को बेचने का इरादा बना चुके थे । थोड़ी देर रूककर बोले-

ठीक है ले जाओ।

जब रऊफ मुराली के बकरे को लेकर जाने लगा तो चिक को मुराली का कुत्ता घेरने लगा और भौंकने लगा। काफी दूर तक रऊफ का भौंकते हुए पीछा किया और अंततः पस्त होकर लौट आया। बकरे के बिक जाने पर दो प्राणी बहुत विचलित हुये एक मुराली और दूसरा कुत्ता। कुत्ता शाम को नियमित बकरे के साथ दौड़ता और खेलता था। आज कुत्ते का मन एक क्षण के लिए भी शांत नही हो पा रहा था।वह बार- बार बकरे के बांधने वाली जगह को सूंघ कर, इधर उधर चक्कर लगा कर जमीन पर बैठ जाता । बकरे के जाने से मुराली और उसका कुत्ता बेचैन हो गए थे,दोनों की स्थिति एक जैसी हो गयी थी।

अगले दिन अमीन मुराली के दरवाजे पर आ धमका। मुराली बकरे के पैसे से दो हजार की रसीद कटवा कर शेष ऋण चुकता कर दिये पर उन्हें लगा जैसे किसी ने सीरिंज से शरीर का सारा खून निचोड़ लिया हो।

आज बकरे को बिके एक माह का समय बीत चुका था। मुराली के गॉव से दो कोस दूर हर मंगलवार और शनिवार को बाजार लगती थी। आज शनिवार था और ऋण चुकाने के बाद बकरे के बेच का सौ रुपया अभी भी शेष बचा था ।मुराली को आज गोश्त खाने की प्रबल इच्छा हुई।पत्नी से झोला मांगकर बाजार की ओर चल पड़े। संयोग से आज रऊफ भी मुराली के बकरे को ज़िबह करने के लिए लाया था।रऊफ पहले बकरे की रत्ती की माला को छुरी से काटा और रत्ती की माला को मीट काटने वाले ठीहे के बगल में रख कर बकरे को ज़िबह कर गोश्त बनाने लगा। मुराली के बाजार पहुँचने तक लगभग पूरा गोश्त बिक चुका था मात्र एक सेर गोश्त बचा था।सूरज छुप चुका था और सांझ बेला हो जाने से कम दिखाई दे रहा था।मुराली रऊफ से आधा सेर गोश्त जल्दी से बना कर तौलने को बोले।रऊफ गोश्त बनाकर ठीहे के बगल में रखता जा रहा था ।दुकान पर अब मुराली और एक अन्य ग्राहक ही बचे थे।दोनों को आधा-आधा सेर गोश्त की जरूरत थी।रऊफ पहले वाले ग्राहक को निपटा कर मुराली को पूरा गोश्त बिना तौले ही दे दिया और बोला चचा आधा सेर से ज्यादा ही होगा कहिये तो तौल दूँ। मुराली बोले रहने दो झोले में डाल दो।

मुराली जब घर लौटे तो अंधेरा हो चुका था।दरवाजे पर लालटेन जल रही थी।मुराली का कुत्ता दरवाजे के पास बैठा था और जब मुराली पत्नी को आवाज लगाए तो वह उनके पास आकर बैठ गया।मुराली पत्नी को झोला पकड़ा कर गोश्त को धुलकर बनाने को बोले। मुराली की पत्नी गोश्त धुलने के बाद एक पीस कच्चा गोश्त कुत्ते को जरूर देती थी।कुत्ता भी जब तक गोश्त नही पा जाता आस -पास मंडराता रहता।मुराली की औरत जब गोश्त धूल रही थी उसका दिल बैठता जा रहा था।अचानक उसकी आँखों के सामने उसका बकरा उछालने कूदने लगा।कभी वह अंदर आता कभी बाहर जाता ।उसे लग रहा था वह यही कही है और अभी उछल कर उसकी गोद में सर रख कर लेट जाएगा। गोश्त धुलने के बाद मुराली की औरत जब गोश्त का एक टुकड़ा कुत्ते की ओर फेंकी उसी समय रत्ती की माला भी जमीन पर गिर पड़ी।कुत्ता गोश्त सूंघकर चला गया और छप्पर के कोने में जाकर चुप-चाप बैठ गया। मुराली की औरत को कुत्ते का व्यवहार बहुत अजीब लगा और जब उसकी नजर पैर के पास गयी तो लालटेन की रोशनी में रत्ती की माला लाल अंगार की तरह जलती हुई दिखाई पड़ी।औरत का रोम -रोम सिहर उठा और मुराली को जोर – जोर से आवाज देकर बुलाने लगी। मुराली जब भागकर आये तो उनकी पत्नी हाथ में रत्ती की माला लिए बुत की तरह खड़ी थी।मुराली सारा माजरा क्षण भर में ही समझ गये और उनकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगा। कुत्ते की ओर इशारा कर बोले- इसे देखों बकरे के संग बस खेला-कूदा था गोश्त सूंघकर ही पहचान गया और नहीं खाया।अब हमारा प्रायश्चित यही है कि आज से हम दोनों गोश्त न खाने की कसम लें,यही हमारी उसके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी…

……हरिन्द्र प्रसाद, इलाहाबाद।

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