दूसरों के ही लिए कुछ मर्म हो हितकारिणी।
दूसरों के ही लिए कुछ मर्म हो हितकारिणी।
मानवी इस सभ्यता का धर्म हो हितकारिणी।
सृष्टि के उन्नत सृजन में मूल्य देकर प्रेम का,
मात्र संयम अरु नियम से कर्म हो हितकारिणी।
राजेश पाली ‘सर्वप्रिय’