छत पे काली घटा घिर आई है
छत पे काली घटा घिर आई है
नींद भी हो चली पराई है
रात भर बादलों ने समझाया
दिल ने जलने की रट लगाई है
मेरी दुश्मन हुई है पुरवा भी
अपने दामन में आग लाई है
मैंने कितने ही पुल बना डाले
दरमियां अपने अब भी खाई है
ये मुकदमा भी हारना तय है
फिर से मुंसिफ ने घूस खाई है