रूप चंद्रघंटा लिए, माता आयी आज।
रूप चंद्रघंटा लिए, माता आयी आज।
कौतूहल वश देखने, लगे छोड़कर काज।।
मस्तक पर राकेश ले, चमक रही है मात।
राका सुंदर हो गया, लता कहे बलखात।।
भक्त सभी वंदन करें, लेकर पूजन थाल।
मात कृपा हमपर करो, जरा बदलकर भाल।।
शरणागत सब हो रहें, लेकर अपनी आश।
माता भक्तों को कभी, करती नहीं निराश।।
“पाठक” नत मस्तक हुआ, चरण धरा निज माथ।
माता हर्षित भाव से, रख दो सिर पर हाथ।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)