“मेरे पिता”
“मेरे पिता”
चमरौधे जूते को
अरंडी के तेल में भिगोकर
रिश्तेदारी जाते हुए
आज भी याद आते हैँ
मेरे पिता।
भादों के महीने में
सन की बद्धी लगे
लकड़ी के पौवे को पहनकर
कीचड़ पार करते
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।
सावन के महीने में
लेव में हल चलाकर
सड़ चुकी कलबलाती उँगलियों को
डढुआ का तेल लगाकर
आग पर सेंकते हुए
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।
बरसात के महीने में
मेहराये हुए चने को
कंडी की आग में
डभका कर खाते हुए
आज भी याद आते हैँ
मेरे पिता।
बांस के हेंगे पर
कुँए के बीचो-बीच
खड़े-खड़े ढेकुल चलाकर
अकड़ी हुई कमर को सीधा करते
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।