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23 Sep 2025 · 1 min read

रघुवर पीड़ा

रौद्र रूप धरि पावस ऋतु बरसै
चित्त रघुवर रह रह आकुलाये ,
सुग्रीव कंदरा, बैठि भ्राता संग
सभा दियो बुलाए ,

सिया सुध मिलै नाहि, अभि तक छिन -छिन पल बितै जाए,
शंकाकुशंका चपल मृगया सी दौड़े, मरूथल थाह न पावे,
बर बस लखन बरषिह, कपि सखा पे खिसियाये,
मात सुधी खोजत काय कू नाहि , सखा ,जे बात बिसराए
कपिराज! बरषत नीर नैनन भीतर, रघुवर! देखि दसा मोहि अधिरावे,
मायाधीस माया रचावत पुरुषोत्तम कहलायो ,
लिन्हें मनुज अवतार प्रभु पल-पल सीख बढायों,
धीर धरू मनुज हित पीड़ा कासे कहियों ,
नैन भींच सुमिरत वरून देव ,
बन सावन अविरल अंसुवन जे बरसायो ,
जल बिन तड़‌पत मीन ज्यौ ,मन
तड़पत वैदेही बिन हरि कैसो दियो बतावे,
पं अंजू पाण्डेय खरोरा

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